विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४० विनय-पत्रिका सुतकी प्रीति, प्रतीति मीतकी, नृप ज्यों उर डरिहै। अपनो सो स्वारथ स्वामी सों, चहुँ विधि चातक ज्यों एक टेक ते नहिं टरिहै ॥२॥ हरषिहै न अति आदरे, निदरे न जरि मरिहै। हानि लाभ दुख सुख सबै समचित हित अनहित, कलि-कुचालि परिहरिहै ॥३॥ प्रभु-गुन सुनि मन हरषिहै, नीर नयननि ढरिहै। तुलसीदास भयो रामको, विस्वास, प्रेम लखि आनंद उमगि उर भरिहैं ॥४॥ शब्दार्थ-परिहै = पड़ेगा। निदरे = निरादर होनेपर। नीर = जल। ढरिहै = गिरने लगेगा। उर = हृदय। भावार्थ-जब मेरा मन विषयोंकी ओरसे लौट पड़ेगा तथा जिस स्वभावसे विषयोंमें लगा हुआ है, उसी सहज स्वभावसे छल छोड़कर नाथसे स्नेह करेगा, तब मैं समझूँगा कि आपने मुझे अपना लिया ॥१॥ जब मेरा मन रामजीसे पुत्रकी तरह प्रेम करेगा, मित्रकी तरह उनपर विश्वास करेगा, राजाकी तरह उनसे अपने हृदयमें डरेगा तथा चारों ओरसे चातककी भाँति उन्हींसे अपने स्वार्थोंकी सिद्धि समझेगा और अपने एक टेकसे न टलेगा ॥२॥ जब वह अत्यन्त आदर पानेपर हर्षित न होगा, निरादर होनेपर जलकर न मरेगा, हानि-लाभ, दुःख-सुख, हित-अहित सबमें समचित्त रहेगा और कलियुगकी कुचालोंको छोड़ देगा ॥३॥ जब मेरा मन प्रभुके गुणोंको सुनकर हर्षित होने लगेगा तथा नेत्रोंसे प्रेमाश्रुकी धारा बहने लगेगी, तब तुलसीदासको विश्वास होगा कि वह श्रीराम- जीका हो गया और तभी उसका हृदय उस प्रेमको देखते ही आनन्दसे उमड़कर परिपूर्ण होगा ॥४॥ विशेष १-'तुम अपनायो......करिहै'—वास्तवमें ऐसा होनेपर ही ईश्वर-भक्ति पैदा होती है और परमात्म-दर्शन सुलभ होता है—भगवत्कृपा होती है। भगवान्ने गीतामें कहा भी है।—देखिये श्रीमद्भगवद्गीता, अ० ८