भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 452

विनय-पत्रिका ४४१ २—'हानि लाभ······परिहरिहै'—वास्तवमें सुख-दुःखादिको समान माननेवाले जिस ज्ञानी पुरुषको उसकी पीड़ा नहीं होती, वही ब्रह्मकी स्थितिको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। यही बात भगवान्ने गीतामें कही है। (देखिये श्रीमद्भगवद्गीता २। १४. १५) [ २६१ ] राम कबहुँ प्रिय लागिहौ जैसे नीर मीन को ? सुख जीवन ज्यों जीवको, मनि ज्यों फनिको हित, ज्यों धन लोभ-लीन को ॥१॥ ज्यों सुभाय प्रिय लगति नागरी नागर नवीन को । त्यों मेरे मन लालसा करिये करुनाकर ! पावन प्रेम पीन को ॥२॥ मनसा को दाता कहैं श्रुति प्रभु प्रवीन को । तुलसिदास को भावतो, वलि जाउँ दयानिधि ! दीजै दान दीन को ॥३॥ शब्दार्थ—फनि = सर्प । नागरी = नायिका । नागर = नायक । नवीन = युवक । पीन = पुष्ट । भावतो = मनचाहा । भावार्थ—हे राम ! क्या आप कभी मुझे ऐसे प्रिय लगेंगे, जैसे मछलीको जल, जीवको सुखमय जीवन, सर्पको मणि, लोभमें लीन रहनेवाले (कंजूस) को धन प्यारा लगता है ? ॥१॥ अथवा जैसे स्वभावसे ही युवक नायकको नायिका प्रिय लगती है, वैसे ही हे करुणाकर ! मेरे मनमें (अपने प्रति) पवित्र और पुष्ट प्रेमकी लालसा उत्पन्न कीजिये ॥२॥ वेदोंका कथन है कि चतुर परमात्मा मनो- वाञ्छाके देनेवाले हैं। अतः हे दयानिधे ! मैं आपकी बलैया लेता हूँ, इस दीन तुलसीदासको उसका चाहा दान दीजिये (ऐसी कृपा कीजिये, जिसमें उसे आप अत्यन्त प्यारे लगें) ॥३॥ विशेष १—'प्रबीन'—यहाँपर प्रभुके लिए प्रबीन कहनेका यह भाव है कि