भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 453

४४२ विनय-पत्रिका परमात्मा घट-घटकी बात जाननेवाले हैं, कहनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। यहाँ 'प्रवीन' शब्द बड़ा ही सार्थक प्रयुक्त हुआ है। २—इस पदमें गुसांईंजीने बड़े ही उच्चकोटिके प्रेमकी आकांक्षा प्रकट की है। उदाहरण भी खूब चुन-चुनकर दिये गये हैं। कविने पीछे भी एक पदमें ऐसी ही आकांक्षा प्रकट की है। वहाँपर रामचरितमानसका नीचे लिखा दोहा भी लिखा जा चुका है— 'कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभीके उर दाम। तिमि रघुनाथ निरन्तर, प्रिय लागहु मोहि राम॥' कितनी ऊँची भावना है ! कैसी अनूठी सूझ है ! वाह ! इस टक्करका दोहा रामचरितमानसमें ढूँढ़नेसे नहीं मिल सकता। [ २७० ] कबहुँ कृपा करि रघुवीर ! मोहू चितैहौ। भलो-बुरो जन आपनो, जिय जानि दयानिधि ! अवगुन अमित बितैहौ ॥१॥ जनम जनम हौं मन जित्यो, अब मोहि जितैहौ। हौं सनाथ हैहौं सही तुम हू अनाथपति, जो लघुताहि न भितैहौ ॥२॥ बिनय करौं अपभयहु तें, तुम्ह परम हितै हौ। तुलसिदास कासों कहै, तुमही सब मेरे, प्रभु गुरु, मातु-पितै हौ ॥३॥ शब्दार्थ—भितैहौं = डरेंगे। अपभयहु = अकारण भयसे। भावार्थ—हे रघुबीर ! क्या आप कभी कृपा करके मेरी ओर भी देखेंगे ? हे दयानिधि ! क्या आप अपने मनमें मुझे भला-बुरा सेवक समझकर मेरे अपार दोषोंका अन्त कर देंगे ? ॥१॥ जन्म-जन्मसे (अनेक जन्मोंसे) यह मन मुझे जीतता आया है (मुझपर अपना अधिकार जमाता आया है); किन्तु अबकी बार क्या आप मुझे जितावेंगे (अर्थात् मैं अपने मनपर विजय पा सकूँगा ? यदि आप इतनी कृपा करेंगे, तो) मैं तो सनाथ हो ही जाऊँगा, आप भी सही-सही 'अनाथपति'