विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४४३ हो जायँगे—हाँ, यदि आप मेरी क्षुद्रतासे न डरेंगे तो। (अर्थात् यदि आप मेरी तुच्छतासे न डरकर मुझे अपना लेंगे तो आपका 'अनाथपति' नाम सार्थक और सही हो जायगा) ॥२॥ (वैसे डरनेका कोई कारण नहीं है, क्योंकि) आप परम हितू हैं, इसीसे मैं अकारण भयसे आपसे विनती कर रहा हूँ। यह तुलसीदास और किससे कहने जाय ? क्योंकि मेरे तो प्रभु, गुरु, माता, पिता आदि सब कुछ केवल आप ही हैं ॥३॥ विशेष १—इस पदमें कविका अत्यन्त दीनता-पूर्ण और बड़ा ही कारुणिक कथन है। [ २७१ ] जैसो हौं तैसो राम रावरो जन, जनि परिहरिये । कृपासिंधु, कोसलधनी ! सरनागत-पालक, ढरनि आपनी ढरिये ॥ १ ॥ हौं तौ बिगरायल और को, बिगरो न बिगरिये । तुम सुधारि आये सदा सब की सब ही बिधि, अब मेरियो सुधरिये ॥२॥ जग हँसिहैं मेरे संग्रहे, कत इहि डर डरिये । कपि-केवट कीन्हे सखा जेहि सील, सरल चित, तेहि सुभाउ अनुसरिये ॥३॥ अपराधी तउ आपनो, तुलसी न बिसरिये । टूटियो बाँह गरे परै, फूटेहु विलोचन, पीर होत हित करिये ॥४॥ शब्दार्थ—ढरनि = बहाव, रीति । ढरिये = ढलिये, चलिये । भावार्थ—हे रामजी ! मैं जैसा हूँ, तैसा आपका हूँ, मुझ सेवकको न छोड़िये। हे कृपा-सागर कोशलनाथ ! आप शरणागतोंका पालन करनेवाले हैं, अतः आप अपनी ही ढारपर ढलिये (अर्थात् अपने बानेके अनुसार मुझ शरणा- गतका पालन कीजिये) ॥१॥ मैं तो औरों (माया, मोहादि या इन्द्रियादि) का बिगाड़ा हुआ हूँ, अतः अब आप इस बिगड़े हुएको न बिगाड़िये—नाराज न