विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४४ विनय-पत्रिका होइये । (क्योंकि मेरा दोष नहीं है—दूसरोंने बिगाड़ा है)। आप सदासे सब लोगोंकी सब तरहसे सुधारते आये हैं, अतः अब मेरी भी (बिगड़ी हुई बातको) सुधारिये ॥२॥ मुझे अपनानेसे संसार हँसेगा, इस डरसे आप क्यों डर रहे हैं ? आपने जिस शील और सरल चित्तसे बन्दर और केवटको अपना मित्र बनाया था, उसी स्वभावका अनुसरण कीजिये ॥३॥ अपराधी होनेपर भी यह तुलसी आपका है, अतः इसे न भूल जाइये । देखिये न, टूटा हुआ हाथ भी गलेमें पड़ा रहता है (कोई उसे अलग नहीं कर देता), और फूटी हुई आँखमें पीड़ा होनेपर उसकी दवा की जाती है, (इसी प्रकार यद्यपि मैं किसी कामका नहीं हूँ, पर हूँ तो आपहीका ! अतः मुझे अपनेसे अलग न कर दीजिये) ॥४॥ विशेष १—'बिगरायल'—ज्ञानियोंने कहा है— कतिपयदिबसस्थायिनि मदकारिणि यौवने दुरात्मानः । विदधति तथाऽपराधं अन्यैव वृथा यथा भवति ॥ अर्थात् 'चन्द दिनके पाहुने किन्तु नशीले इस यौवनमें अज्ञानी लोग वह अपराध कर बैठते हैं जिससे जवानी ही क्या, उनका सम्पूर्ण जन्म ही व्यर्थ हो जाता है।' इसीसे गोस्वामीजी भी कह रहे हैं कि, 'मैं तो पहलेहीसे दूसरोंका बिगाड़ा हुआ हूँ', इसमें मेरा अपराध नहीं है। जब दूसरोंने, अर्थात् इन्द्रियोंने अथवा माया-मोहादिने मुझे ऐसा बिगाड़ दिया है कि मेरा सम्पूर्ण जन्म ही व्यर्थ हो जायगा, तो फिर आपके सुधारे बिना मेरा सुधार कैसे हो सकता है ? इसलिए इस बिगड़े हुए दासपर आप न बिगड़िये । [ २७२ ] तुम जनि मन मैलो करो, लोचन जनि फेरो । सुनहु राम ! बिनु रावरे लोकहु परलोकहु कोउ न कहूँ हित मेरो ॥१॥ अगुन-अलायक-आलसी जानि अधम अनेरो । स्वारथ के साथिन्ह तज्यो तिजराको-सो तोटक, औचट उलटि न हेरो ॥२॥