विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४४५ भगति हीन, बेद-बाहिरो लखि कलिमल घेरो। देवनि हू देव ! परिहऱ्यो, अन्याव न तिनको, हौं अपराधी सब केरो ॥३॥ नाम की ओट पेट भरत हौं पै कहावत चेरो। जगत-बिदित बात है परी, समुझिये धौं अपने, लोक कि बेद बड़ेरो ॥४॥ है है जब-तब तुम्हहिं तें तुलसी को भलेरो। दिन-हू-दिन देव ! विगरि है, बलि जाउँ, बिलंब किये, अपनाइये सबेरो ॥५॥ शब्दार्थ—अगुन = गुणहीन। अनेरो = निकम्मा। तोटक = टोटका। सबेरो = शीघ्र। भावार्थ—हे नाथ ! आप अपने मनको मेरे लिए मैला न करें, और मेरी ओरसे निगाहें न फेरें। हे रामजी ! सुनिये, आपको छोड़कर न तो इस लोकमें ही और न परलोकमें ही कहीं कोई मेरा कल्याण करनेवाला है॥१॥ मुझे गुणहीन, नालायक, आलसी, नीच और निकम्मा जानकर मतलबके यारोंने तिजारीके टोटकेकी तरह छोड़ दिया और भूलसे भी उलटकर मेरी ओर न देखा ॥२॥ मुझे भक्ति-रहित और वेद-मार्गसे बाहर देखकर कलिके पापोंने घेर लिया। इससे हे देव ! मुझे देवताओंने भी त्याग दिया। किन्तु इसमें उनका कोई अन्याय नहीं है; क्योंकि मैं (स्वयं ही) सबका अपराधी हूँ ॥३॥ मैं आपके नामकी आड़में पेट भरता हूँ, फिर भी अपनेको आपका दास कहल- वाता हूँ। किन्तु अब तो यह बात संसारमें विदित हो गयी (कि मैं राम-भक्त हूँ)। अतः आप ही विचार कीजिये कि लोक बड़ा है या वेद ? (मेरी करनी तो वेद-विदित नहीं है, किन्तु संसार मुझे 'राम-दास' कहता है; अतः आप जो उचित समझें, स्वीकार करें) ॥४॥ तुलसीका भला तो जब कभी होगा, तब आपहीसे होगा। अतः मैं आपकी बलैया लेता हूँ, यदि आप देर करेंगे तो यह गरीब दिनपर दिन बिगड़ता ही जायगा, (इसीसे कहता हूँ कि जब आपको कभी- न-कभी मेरा कल्याण करना ही पड़ेगा, तो) शीघ्र मुझे अपना लीजिये ॥५॥ विशेष १—'तिजराको-सो तोटक'—तिजारीमें आधीरातके समय अनेक चीजोंमें