भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 457

४४६ विनय-पत्रिका उतारा करके लोग चौराहेपर रख आते हैं । लौटते समय उस ओर देखा नहीं जाता । यदि कोई उस टोटकेकी ओर देख ले, तो उसे तिजारी ज्वर आने लगता है । २—'लोक कि बेद बड़ैरो'—'लोक बड़ा है या वेद, इसपर एक कहावत भी है— 'यद्यपि शुद्धम् लोकविरुद्धम् न करणीयम् न करणीयम् ।' अर्थात् 'यद्यपि कोई बात शुद्ध है यानी वेदविहित है, पर वह लोकके विरुद्ध है, तो वह करने योग्य नहीं है—नहीं है ।' इस कहावतसे भी लोककी श्रेष्ठता सिद्ध हो रही है । भगवान् रामचन्द्र भी इस बातके कायल हैं । तभी तो उन्होंने परम पवित्र और निष्कलंक जगज्जननी जानकीजीको घरसे निकाल कर, लोकका श्रेष्ठत्व सिद्ध किया था । जान पड़ता है कि गुसांईजीने उसी बातपर लक्ष्य रखकर 'लोक कि बेद बड़ैरो' लिखा है । [ २७३ ] तुम तजि हौं कासों कहौं, और को हितु मेरे ? दीनबंधु ! सेवक-सखा, आरत अनाथ पर सहज छोह केहि केरे ॥१॥ बहुत पतित भवनिधि तरे बिनु तरि, बिनु बेरे । कृपा-कोप-सति भायहू, धोखेहु-तिरछेहु, राम ! तिहारेहि हेरे ॥२॥ जो चितवनि सौंधी लगै, चितइये सवेरे । तुलसिदास अपनाइये, कीजै न ढील, अब जीवन-अवधि अति नेरे ॥३॥ शब्दार्थ—तरि = नौका । ( पाठान्तर 'तरिनि' ) । बेरे = बेड़ा । सौंधी = भली । नेरे = निकट । सवेरे = जल्द । भावार्थ—हे नाथ ! आपको छोड़कर मैं और किससे कहूँ? दूसरा कौन मेरा हितू है ? हे दीनबन्धो ! सेवकपर, सखापर, दुखियापर और अनाथपर सहज स्नेह और किसका है ? ॥१॥ बहुतसे पापी बिना नौका और बेड़ेके ही

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