भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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४३० विनय-पत्रिका राग रोष द्वेष पोषे, गोगन समेत मन, इनकी भगति कीन्ही इन ही को भाउ मैं ॥३॥ आगिली-पाछिली, अब हूँ की अनुमान ही तें, बूझियत गति, कछु कीन्हों तो न काउ मैं । जग कहै रामकी प्रतीति-प्रीति तुलसी हू, झूठे-साँचे आसरो साहब रघुराउ मैं ॥४॥ शब्दार्थ—आउ = आयु । पीन = पुष्ट । आउ-बाउ = आव-बाव, अनाप-शनाप । दुरित = पाप । दुराउ = छिपाव । गो-गन = इन्द्रियाँ । भावार्थ—हे राम ! मेरे बनानेसे मेरी करोड़ों कल्पतक न बनेगी । किन्तु आपके बनानेसे मेरी पाव (चौथाई) पलमें ही बन जायगी । आप परम चतुर हैं । हे कृपानिधान ! मैं क्या कहूँ ! मैंने तो अनमोल मणिरूपी आयुके बदलेमें (विषयरूप) बेर ले लिये ॥१॥ मेरा मानस मलिन हो गया है और कर्तब कलियुगी पापोंसे पुष्ट हो गया है; जीभने भी रामनामका जप नहीं किया, वह आयँ-बायँ बकती रही । कुमार्गपर कुचालें चलता रहा, भूलकर भी अच्छा काम न बन पड़ा । बचपनमें भी खेलते समय मैंने अच्छा दाव नहीं खेला ॥२॥ किसीकी देखादेखी, दम्भसे, या सत्संगसे यदि कोई अच्छा काम हो गया, तो उसे प्रत्यक्ष रूपसे लोगोंको जनाया और पापोंको छिपा लिया । मैंने राग, द्वेष, क्रोध और इन्द्रियोंके सहित मनका पोषण किया, इन्हींकी भक्ति की और इन्हींका भाव (आदर) किया ॥३॥ मैंने आगेकी (आनेवालेकी), पीछेकी (बीते हुएकी), और अबकी गतिका अनुमान करके समझ लिया कि मुझसे कभी कुछ नहीं बना, (और न बन सकता है) । संसार कहता है 'तुलसी रामका है' और यह तुलसी भी आपपर ही विश्वास और प्रेम रखता है । सच हो या झूठ, हे रघुनाथ स्वामी ! मैं तो आपहीके आसरे हूँ ॥४॥ [ २६२ ] कह्यो न परत, बिनु कहे न रह्यो परत, बड़ो सुख कहत बड़े सों, वलि, दीनता ।