विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४२१ तो गिनती ही क्या ! मैं तो बाजा बजाता हुआ (डंकेकी चोट) नष्ट हुआ जा रहा हूँ। जब इस लोकमें ही (मेरे लिए रहनेकी) जगह नहीं है, तो फिर मैं परलोक- का क्या भरोसा करूँ ? बलि जाऊँ, मैं तो केवल राम-नामकी ही शरणमें हूँ ॥१॥ कर्म, स्वभाव, काल, काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी बड़े-बड़े ग्राहोंने और गरीबीने मुझे दृढ़तासे पकड़ लिया है। हे महाराज ! बाँधनेके लिए तो करोड़ों योद्धा हैं, पर छुड़ानेके लिए केवल आप ही हैं। अतः हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ! मैं पापके तीनों तापोंसे जल रहा हूँ ॥२॥ लोगोंका रीझना समझकर मेरी प्रतीति और प्रीति इसी द्वारपर है। मैं तो दूधका जला हुआ हूँ, इसीसे मट्ठेको भी फूँक-फूँककर पीता हूँ। मैं रटते-रटते थक गया, जाति-पाँति और चाल-चलन भी नष्ट हो गयी। मैं तो केवल जूठनका लालची हूँ, दूधसे नहाना नहीं चाहता (अर्थात् मैं आपके चरणोंमें पड़े रहना चाहता हूँ, मुझे स्वर्गीय भोगोंकी इच्छा नहीं) ॥३॥ मैंने सुमार्गपर अच्छी चाल चलकर अन्यत्र अपनी भलाई नहीं चाही। यहाँ आपसे तिरस्कृत होनेपर भी मैं अच्छी तरह अपने दिलमें जानता हूँ कि मेरा भला है। इस बातको तुलसीने खूब समझकर अपने मनको बार-बार समझाया है, और वह उसे अपने स्वामीसे (आपसे) भी कहकर पाक हो गया है ॥४॥ [ २६१ ] मेरी न बनै बनाये मेरे कोटि कलप लौं राम ! रावरे बनाये बनै पल पाउ मैं । निपट सयाने हौ कृपानिधान ! कहा कहौं ? लिये बेर बदलि अमोल मनि आउ मैं ॥१॥ मानस मलीन, करतब कलिमल पीन जीह हू न जप्यो नाम, बक्यो राउ-राउ मैं । कुपथ कुचाल चल्यो, भयो न भूले हूँ भलो, बाल-दसा हू न खेल्यो खेलत सुदाउ मैं ॥२॥ देखा-देखी दम्भ तें कि संग तें भई भलाई, प्रगटि जनाई, कियो दुरित-दुराउ मैं ।