विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४२५ करत जतन जासों जोरिबेको जोगी जन, तासों क्यों हू जुरी, सो अभागो बैठो तोरि हौं ॥१॥ मोसे दोस-कोसको भुवन-कोस दूसरो न, अपनी समझि सूझि आयो टकटोरि हौं। गाड़ी के स्वान की नाईं, माया मोहकी बड़ाई, छिनहिं तजत, छिन भजत बहोरिहौं ॥२॥ बड़ो साईं-द्रोही न बराबरी मेरी को कोऊ, नाथ की सपथ किये कहत करोरि हौं। दूरि कीजै द्वार तें लबार लालची प्रपंची, सुधा-सो सलिल सूकरी ज्यों गद्होरि हौं ॥३॥ राखिये नीके सुधारि, नीचको डारिये मारि, दुहूँ ओर की विचारि, अब न निहोरि हौं ॥ तुलसी कही है साँची रेख बार-बार खाँची, ढील किये नाम-महिमाकी नाव बोरि हौं ॥४॥ शब्दार्थ-कोस = कोष, खजाना । भुवन-कोस = चौदहो भुवन या तीनों लोक । टकटोरि = टटोलना, ढूँढ़ना । बहोरि = फिर । लवार = झूठा । गद्होरि हौं = मथकर गँदला कर डालूँगा । भावार्थ-हे कृपानिधान ! मैंने जान-पहचानकर आपको भुला दिया है; मुझे इतना अभिमान हो गया है और मैं इतना ढीठ हो गया हूँ कि उलटा आपको दोष देता हूँ (कि आप कृपानिधान होकर भी मुझपर कृपा नहीं कर रहे हैं) । जिससे नाता जोड़नेके लिए योगी लोग यत्न किया करते हैं, उससे यदि थोड़ी-सी प्रीति जुड़ी भी थी, तो मैं अभागा उसे तोड़ बैठा ॥१॥ अपनी सूझ और समझके अनुसार मैं टटोल आया, पर चौदहो भुवन या तीनों लोकमें मुझसा दोषोंका खजाना दूसरा कोई नहीं है। गाड़ीके (पीछे लगे हुए) कुत्तेकी नाईं कभी तो मैं माया-मोहके बड़प्पनको क्षणभरमें ही छोड़ देता हूँ, और फिर क्षणभरमें उसीको भजने लगता हूँ (अर्थात् जैसे गाड़ीके पीछे लगा हुआ कुत्ता कभी तो गाड़ीको छोड़कर दूर निकल जाता है, और कभी उसके साथ हो लेता