भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 437

४२६ विनय-पत्रिका है, वही दशा मेरी है) ॥२॥ हे नाथ ! मैं आपकी (एक नहीं) करोड़ों शपथ करके कहता हूँ कि मैं बड़ा भारी स्वामि-द्रोही हूँ, मेरी बराबरीका (स्वामि-द्रोही) कोई नहीं है। इसलिए मुझ झूठे, लालची और प्रपंचीको आप अपने द्वारसे दूर कर दीजिये, नहीं तो मैं अमृतके समान जलको सूकरीकी तरह मथकर गँदला कर डालूँगा (आपके पवित्र यशको मलीन बना दूँगा) ॥३॥ दोनों ओरकी बातोंपर विचार करके या तो मुझे अच्छी तरह सुधारकर (अपनी शरणमें) रखिये, और या मुझ नीचको मार डालिये। (यदि आप इन दोनों बातोंमेंसे एक भी न करेंगे, तो) अब मैं आपका निहोरा न करूँगा। तुलसीने बार-बार लकीर खींचकर सच्ची बात कही है। यदि आप ढिलाई करेंगे तो मैं आपके नामकी महिमाका जहाज डुबो दूँगा। भाव यह है कि संसार कहने लगेगा कि तुलसी राम-नाम रटता ही रहा, पर कुछ न हुआ; इसलिए रामनामकी जो बड़ी भारी महिमा ग्रन्थोंमें लिखी हुई है, वह झूठी है ॥४॥ विशेष १—'राखिये・・・・・'निहोरिहौं'—इसमें कविकी हार्दिक झुँझलाहट दिखाई पड़ती है। २—'ढील किये・・・・・बोरिहौं'—शपथपूर्वक मजेदार धमकी है। ऐसी ही धमकी भक्तवर सूरदासजीने भी दी है— आजु हौं एक एक करि टरि हौं। कै हम ही कै तुम ही माधव, अपुन भरोसे लरिहौं ॥ हौं तो पतित अहौं पीढ़िन को, पतित ह्वै निस्तरिहौं । अब हौं उघरि नचन चाहत हौं, तुम्हें बिरद बिनु करिहौं ॥ कत अपनी परतीति नसावत मैं पायो हरि हीरा। सूर पतित तब ही लै उठिहै जब हँसि दैहौ बीरा ॥ [ २५९ ] रावरी सुधारी जो बिगारी बिगरेगी मेरी, कहौं, बलि, बेद की न, लोक कहा कहैगो ?