विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४२७ प्रभुको उदास-भाउ, जनको पाप-प्रभाउ, दुहूँ भाँति दीनबन्धु ! दीन दुख दहैगो ॥१॥ मैं तो दियो छाती पवि, लयो कलिकाल दबि, साँसति सहत, परवस को न सहैगो ? बाँकी विरुदावली बनेगी पाले ही कृपालु ! अन्त मेरो हाल हेरि यों न मन रहैगो ॥२॥ करमी-धरमी साधु-सेवक, बिरत-रत, आपनी भलाई थल कहाँ कौन लहैगो ? तेरे मुँह फेरे मोसे कायर-कपूत-कूर, लटे लटपटनि को कौन परिगहैगो ? ॥३॥ काल पाय फिरत दसा दयालु ! सब ही की, तोहि बिनु मोहि कबहूँ न कोऊ चहैगो । वचन-करम-हिये कहौं राम ! सौंह किये, तुलसी पै नाथके निबाहेई निबहैगो ॥४॥ शब्दार्थ—पवि = वज्र । लटे = थके हुए, गिरे हुए । लटपटनि = लटपटाये हुए । परिगहैगो = ग्रहण करेगा । सौंह = शपथ । भावार्थ—यदि आपकी सुधारी हुई या बनायी हुई बात मेरे बिगाड़नेसे बिगड़ जायगी तो मैं आपकी बलैया लेकर कहता हूँ—वेदोंकी तो नहीं कहता किन्तु भला संसार क्या कहेगा ? (अर्थात् वेद चाहे जो कहें, पर संसार यही कहेगा कि तुलसीने रामजीकी बनायी हुई बातको भी बिगाड़ दिया) हे प्रभो ! यदि आपका उदासीन भाव रहा अथवा सेवकके पापने ही अपना प्रभाव दिखाया, तो हे दीनबन्धो ! दोनों ही प्रकारसे यह गरीब दुःखाग्निसे जलेगा ॥१॥ मैंने तो वज्रका आघात सहनेके लिए छाती खोल दी है, क्योंकि कलिकालने दबा लिया है । मैं कष्ट सह रहा हूँ । (यदि आप कहें कि क्यों कष्ट सह रहा है, तो) भला ऐसा कौन परतन्त्र मनुष्य है जो न सहेगा ? किन्तु हे कृपालु ! आपको अपनी बाँकी बिरदावलीका पालन करना ही पड़ेगा (अर्थात् मुझे उबारना ही पड़ेगा) । क्योंकि अन्तमें मेरा हाल देखकर आपका मन ऐसा न रहेगा (तात्पर्य यह कि