विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५० विनय-पत्रिका जन्मे हुए (बच्चे) को त्याग देता है।' गीता प्रेसकी प्रतिमें भी 'साँप' की जगह 'सर्पिणी' के सिवा और अर्थ ज्योंका-त्यों है। पर यह अर्थ ठीक नहीं जँचता; क्योंकि सर्पिणी तो अपने बच्चोंको पैदा करके छोड़ नहीं देती बल्कि निगलने लगती है। हाँ, उसके वे बच्चे अवश्य बच जाते हैं, जिन्हें वह नहीं देख पाती। दूसरी बात यह कि यद्यपि उपमा एक ही अंशमें दी जाती है, फिर भी हृदय इस बातको स्वीकार नहीं करता कि गुसाईंजीने अपने माता-पिताओं साँपसे उपमा दी होगी। पं० रामनरेश त्रिपाठीने श्रीराम-चरित-मानसकी भूमिकामें 'कुटिल' शब्दको 'कुटीला' का अपभ्रंश माना है और इसका अर्थ किया है 'केकड़ा'। अर्थात् केकड़ेकी तरह पेट फाड़कर पैदा हुआ।' किन्तु इस अर्थमें भी 'मातु पिता हू' की संगति ठीक नहीं बैठती। मादा केकड़ेका पेट फाड़कर पैदा हुए; किन्तु पिताके लिए क्या कहा गया है? इस अर्थमें खींचा-तानी बहुत करनी पड़ती है। मेरी समझमें यदि 'कुटिल कीट' का अर्थ 'दुष्ट कीड़ा' किया जाय तो अधिक उत्तम हो। ऐसा अर्थ करनेमें किसी तरहकी खींचातानी नहीं करनी पड़ती और साधु अर्थ निकल आता है। इसका अन्वय इस प्रकार किया जायगा—'मातु तनु जन्यो ज्यों कुटिल कीट, पिता हू तज्यो' ऐसा अन्वय करनेपर सरल और साधु अर्थ निकल आता है। इससे ज्ञात होता है कि गोस्वामीजीके माता-पिता इनके बाल्यकालमें ही स्वर्गवासी हो गये थे जो कि सही भी है। [ २७६ ] कहा न कियो, कहाँ न गयो, सीस काहि न नायो ? राम रावरे बिन भये जन जनमि-जनमि जग दुख दस हू दिसि पायो ॥१॥ आस-बिबस खास दास है नीच प्रभुनि जनायो । हा हा करि दीनता कही द्वार-द्वार बार-बार, परी न छार, मुँह बायो ॥२॥ असन-बसन बिनु बावरो जहँ तहँ उठि धायो । महिमा-मान प्रिय प्रान ते तजि खोलि खलनि आगे, खिनु खिनु पेट खलायो ॥३॥