विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ४५१ नाथ ! हाथ कछु नाहिं लग्यो, लालच ललचायो । साँच कहौं, नाच कौन सो, जो न मोहिं लोभ लघु हौं निरलज्ज नचायो ॥४॥ श्रवन-नयन-मन मग लगे, सब थल पतितायो । मूड़ मारि, हिय हारि कै, हित हेरि हहरि अब चरन-सरन तकि आयो ॥५॥ दसरथके ! समरथ तुही, त्रिभुवन जसु गायो । तुलसी नमत अवलोकिये, बलि, बाँह बोल दै बिरुदावली बुलायो ॥६॥ शब्दार्थ—छार = राख । असन = भोजन । बसन = वस्त्र । खिनु = क्षण । पतितायो = विश्वास किया, पतियाना । हेरि = ढूँढ़कर । नमत = प्रणाम करता है । भावार्थ—मैंने क्या नहीं किया ? कहाँ नहीं गया ? और किसके आगे सिर नहीं झुकाया ? किन्तु हे रामजी ! जबतक मैं आपका दास नहीं हुआ, तबतक मैंने संसारकी दसों दिशाओंमें जन्म ले-लेकर दुःख ही पाया ॥१॥ आशावश (आपका) खास सेवक (ईश्वरका अंश) होनेपर भी मैंने क्षुद्र प्रभुओंको जनाया, हा-हा करके बार-बार द्वार-द्वार अपनी दीनता कही, किन्तु मेरा मुँह बाया ही रह गया, उसमें खाक भी न पड़ी (भोजनको कौन कहे) । अर्थात् मैं माँगता ही रह गया, पर किसीने कुछ नहीं दिया । भोजन और वस्त्रके बिना बावला होकर जहाँ-तहाँ दौड़ता फिरा, प्राणोंसे प्यारी मान-प्रतिष्ठाको त्यागकर दुष्टोंके आगे क्षण-क्षणपर खाली पेटको खोलकर दिखाया ॥३॥ किन्तु हे नाथ ! कुछ भी हाथ न लगा, लालच मुझे ललचाता ही रह गया । सच कहता हूँ, ऐसा कौनसा नाच है जो क्षुद्र लोभने मुझ निर्लज्जको न नचाया हो ? ॥४॥ कान, आँखें और मन ये सब अपने-अपने रास्तेपर लग गये । सब जगह विश्वास किया, सिर पटककर रह गया, अपना हितू ढूँढ़कर थक गया (कहीं कोई नहीं मिला) । अन्तमें हृदयमें हार मानकर अब आपके चरणोंकी शरण देखकर आया हूँ ॥५॥ हे दशरथके लाल ! सामर्थ्यवान् एक आप ही हैं, इसीसे तीनों लोकोंने आपका यश गाया है । तुलसीदास प्रणाम करता है, (इसकी ओर)