विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ विनय-पत्रिका शब्दार्थ—संदोह = समूह । मंजुलाकरमने = (मंजुल+आकर-मने) खानसे निकली हुई मनोहर मणि। कामापवर्गद = (काम + अपवर्ग+द) काम और मोक्षके दाता। कर्षण = खींचनेवाले। विद्यमान = मौजूदगीमें। भूमिजा = जानकीजी। रोषांतकृत = (रोष+ अन्तकृत) क्रोधके कारण प्रलय करनेवाले (अन्तकृत) यम। जातुधानी = राक्षसी। मकरंद = पुष्परस, मधु। मधुकर = भ्रमर। पाहि = त्राहि या रक्षा करो। भावार्थ—तुम्हारी जय हो ! तुम अतिशयानन्दके समूह, बानरोंमें साक्षात् सिंह, केशरीके पुत्र और संसारके एकमात्र स्वामी हो। तुम अंजनीरूपी दिव्य पृथिवीकी खानसे निकली हुई मनोहर मणि हो और भक्तोंके सन्तापों और चिन्ताओंको हरनेवाले हो ॥१॥ हे विभो ! तुम्हारी जय हो ! तुम धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके देनेवाले हो और तुम्हें ब्रह्मलोक आदिके वैभवसे भी विराग है। तुमने मन, वचन और कर्मसे सत्यको ही अपना धर्मव्रत बना रखा है। तुम श्रीरामजीके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले हो ॥२॥ जय हो ! तुम गरुड़के बल, बुद्धि और वेगके बड़े भारी गर्वको हरनेवाले तथा कामदेवका नाश करनेवाले ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी हो। तुम महानाटकके निपुण रचयिता और अभिनेता हो, करोड़ों महाकवियोंके कुल-तिलक हो और गान-विद्याके गुणका गर्व करनेवाले गन्धर्वोंको जीतनेवाले हो ॥३॥ जय हो ! तुम वीरोंके सिरमौर महा अभिमानी रावणकी उपस्थितिमें उसकी स्त्री मन्दोदरीका केश पकड़कर खींचनेवाले हो। तुमने जगज्जननी जानकीजीके दुःखसे उत्पन्न क्रोधके वश हो राक्षसियोंकी ऐसी यातना की थी, जैसी यमराज तमाम प्राणियोंकी किया करता है ॥४॥ तुम्हारी जय हो ! रामायण सुननेसे तुम्हारा शरीर पुलकित हो जाता है, नेत्र सजल हो जाते हैं और कंठ गद्गद हो जाता है। हे श्रीरामजीके चरण-कमलोंके रसके भ्रमररूप हनुमानजी ! त्राहि, त्राहि ! हे त्रिशूलधारी रुद्ररूप हनुमानजी ! तुलसी- दास तुम्हारी शरण है। विशेष १—'ऊर्ध्वरेता'—ऋग्वेदमें दो तरहके ब्रह्मचारियोंका उल्लेख है; ऊर्ध्व- रेतस् और अमोघवीर्य। जिस ब्रह्मचारीका वीर्य नीचेकी ओर न आकर ऊर्ध्व- गामी हो जाता है, उसे ऊर्ध्वरेता कहते हैं। यह साधना सर्वश्रेष्ठ और दुर्लभ है। अमोघवीर्य उसे कहते हैं जिस ब्रह्मचारीका वीर्य कभी भी निष्फल न