विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ५५ जाय । अर्थात् उससे गर्भाधान अवश्य हो जाय। हनुमानजी सर्वोच्च कोटिके अखंड ब्रह्मचारी माने जाते हैं। २—'महानाटक'—हनुमानजीने एक बृहद्नाटकमें राम-चरित वर्णन किया था। कोई अधिकारी न मिलनेके कारण उन्होंने उसे समुद्रमें डाल दिया। दामोदर मिश्रने उसके रहे-सहे अंशका संकलन करके वर्त्तमान हनुमन्नाटक निर्माण किया। ३—'मन्दोदरी-केस-कर्षण'—हनुमानजीके आदर्श-चरितके वर्णनमें यह प्रसंग यानी एक स्त्रीका केश पकड़कर खींचना खटकता है। पर वास्तवमें यहाँ खटकनेकी कोई बात नहीं है। क्योंकि वह प्रभुकी आज्ञासे रावणका यज्ञ भंग करने गये थे और उसीपर रावणका परास्त होना निर्भर था। जब उन्होंने यज्ञ भंग करनेकी और कोई सूरत न देखी, तो यह काम करनेके लिए उन्हें विवश होना पड़ा। उन्होंने सोचा कि रावण अपनी स्त्रीका अपमान कदापि न देख सकेगा और यज्ञ छोड़कर अवश्य उठ खड़ा होगा। वही हुआ भी। विवश होनेपर अनन्य भक्तके लिए अनुचित और उचितका विचार छोड़कर प्रभुकी आज्ञा-पालन करना स्वाभाविक है। इसके सिवा कहींपर यह उल्लेख पाया जाता है कि हनुमानजीने जिस मन्दोदरीका केस कर्षण किया था, वह मायाकी बनी हुई कल्पित मन्दोदरी थी। राग सारङ्ग ( ३० ) जाके गति है हनुमान की। ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषान की ॥१॥ अघटित-घटन, सुघट-विघटन; ऐसी विरुदावलि नहिं आन की। सुमिरत संकट-सोच विमोचन, मूरति मोद निधान की ॥२॥ तापर सानुकूल गिरिजा, हर, लषन, राम अरु जानकी। तुलसी कपि की कृपा विलोकनि, खानि सकल कल्यान की ॥३॥ शब्दार्थ—गति = भरोसा, सहारा। पैज = प्रतिज्ञा। रेखा = लकीर, लीक। अघटित =