भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

विनय-पत्रिका ५७ उथपे = उखड़े हुए। रद = दाँत। विलोचन-कोर = हनुमानजी। रनरोर = युद्धक्षेत्रमें शोर करनेवाले रणबाँकुरे। गयी-बहोर = गयी हुई वस्तुको फिरसे दिलानेवाले। भावार्थ—जिसे सब प्रकारसे केशरी-कुमार हनुमानजीका ही भरोसा है, उसकी ओर क्रुद्ध होकर कौन देखेगा ? ॥१॥ भक्तोंको प्रसन्न करने, शत्रुओंका संहार करने तथा दुष्टोंका मुँह तोड़ने योग्य बलवान् और कौन है ? इनका पुरुषार्थ वेदों और पुराणोंमें प्रकट है। सब शूरवीरोंमें शिरोमणि इनके समान और कौन है ? ॥२॥ इनके सिवा उखड़े हुए (सुग्रीव, विभीषण-सरीखे) लोगोंको राज्यसिंहासनपर स्थापित करनेवाला, सिंहासनपर स्थित (बालि, रावण आदि) महा बलवान् राजाओंको राज्यच्युत करनेवाला, प्रणपूर्वक बन्दी देवताओंको छुड़ानेवाला कौन है ? समुद्र लाँघकर लंकाको जलानेवाला तथा बड़े बलवान् एवं भयानक राक्षसोंका नाश करनेवाला कौन है ? ॥३॥ जिनके बाल-विनोदका मन ही मन स्मरण करके अब भी प्रातःकालीन सूर्य डरा करते हैं और जिनकी ठुड्डीकी चोटने कठोर वज्रके दाँतोंका घमण्ड चूर कर दिया था ऐसा और कौन है ? ॥४॥ लोकपाल भी उन हनुमानजीकी कृपादृष्टि चाहा करते हैं। रणमें हल्ला करनेवाले हनुमानजीका जो सेवक है, वह सदा निर्भय रहता तथा आनन्द मंगलमय विजय-लाभ करता है ॥५॥ पूर्णचन्द्रवत् श्रीरामजीकी मुखच्छविको चकोरकी भाँति निहारनेवाले हनुमानजीका नाम भक्तोंके लिए कल्पवृक्षके समान है। हे तुलसीदास ! गयी हुई वस्तुको फिरसे दिला देनेवाले श्रीहनुमानजीका जो यश गाता है, उसकी हथेलीपर चारों फल (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) धरे रहते हैं ॥६॥ विशेष १—'विलोचन कोर'—यह हनुमानजीके लिए कहा गया है। इसका शाब्दिक अनुवाद कोरदार आँखोंवाले किया जा सकता है। पर इसमें रसका वह परिपाक कहाँ जो 'विलोचन कोर' में है ? साहित्य-रसज्ञ ही कविके इस प्रयोगका ठीक-ठीक रसास्वादन कर सकते हैं। २—'डरत दिवाकर' और 'रद-मद कुलिस' को २५ पदके विशेष विवरणमें देखिये।