विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ विनय-पत्रिका राग-बिलावल ( ३२ ) ऐसी तोहि न बूझिये हनुमान हठीले । साहेब कहूँ न राम से, तोसे न उसीले ॥१॥ तेरे देखत सिंह के सिसु मेढक लीले । जानत हौं कलि तेरेऊ मन गुनगन कीले ॥२॥ हाँक सुनत दसकन्ध के भये बन्धन ढीले । सो बल गयो किधौं भये अब गरब गहीले ॥३॥ सेवक को परदा फटे तू समरथ सीले । अधिक आपुते आपुनो सुनि मान सहीले ॥४॥ साँसति तुलसीदास की सुनि सुजस तुही ले । तिहूँकाल तिनको भलौ जे राम रँगीले ॥५॥ शब्दार्थ—उसीले = बसीला, सेगा; जिसके द्वारा राजाके पास किसीकी पहुँच होती है, वह उसका वसीला कहलाता है। कीले = कील दिया, बाँध दिया। बंधन = अङ्गोंके जोड़। सीले = सी दो, टाँके लगा दो। साँसति = कष्ट। कथा-प्रसंग—जब गोस्वामीजी चिरकालतक अंजनी-ललाका भजन करते रह गये, किन्तु उनपर श्रीरामजीकी कृपा न हुई, तब उन्होंने खिन्न होकर ऊपरके पदकी रचना की थी। भावार्थ—हे हठीले हनुमान ! तुझे ऐसा नहीं चाहिये । रामजीके समान कहीं स्वामी नहीं हैं और तेरे समान वसीला नहीं है ॥१॥ तेरे देखते-देखते मुझ सिंह-शावकको कलियुगरूपी मेढक निगले जा रहा है। मैं जानता हूँ कि कलिने तेरे मन और गुणोंको भी कील दिया है ॥२॥ तेरी हुंकार सुनते ही रावणके बन्धन ढीले पड़ गये थे; कह नहीं सकता कि अब तुझमें वह बल रहा ही नहीं अथवा तू गर्वीला हो गया ॥३॥ सेवकका पर्दा फटनेपर तू उसे सी लेनेमें समर्थ है; अर्थात् सेवककी पोल खुलती देखकर तू उसकी रक्षा कर सकता है; क्योंकि तू अपनेसे अधिक अपने सेवककी सुनता और उसका मान सहनेवाला है ॥४॥ तुलसीदासका कष्ट सुनकर उसे दूर करनेका यश तू ही ले। क्योंकि जो रामके रँगीले हैं, उनका तो तीनों कालमें कल्याण ही है अर्थात् अब