भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

६० विनय-पत्रिका घरघरसे थोड़ा-थोड़ा अन्नादि देनेका जो प्रबन्ध किया जाता है उसे खोंची कहते हैं, इया = यार अथवा दोस्त। बिया = दूसरा। छार = राख। छिया = छिः छिः, छीलालेदर, नरक। भावार्थ—हे सामर्थ्यवान पवनकुमार ! हे रघुनाथजीके प्यारे ! तुम्हें मुझपर जो कुछ करना हो सो भैया कर लो ॥१॥ तुम्हारी महिमासे इमलीके चिये भी सिक्केकी जगह चल जाते हैं। फिर मेरे ही लिए हे तीनों लोकके उजागर, तुमने इतना अन्धेर क्यों कर रखा है ॥२॥ पहले तुमने मेरी किस करनीसे अपना भक्त जानकर मेरा सम्मान किया था, और अब किस पाप और अवगुणसे मुझे अपने हाथसे छोड़ दिया ? ॥३॥ मैंने तो तुम्हारा ही नाम लेकर खोंचीका अन्न माँगा और खाया । तुम्हारी बलैया लेता हूँ, मैं तो तुम्हारे ही बलपर आजतक संसारमें उजागर होकर जीवित रहा हूँ ॥४॥ यदि तुमसे विमुख होनेका कारण मेरा हृदय होता, तो फिर मैं यह वचन कहकर तुम्हें अपना मुँह कैसे दिखाता ? ॥५॥ तुम्हारे समान महाज्ञानी और सर्वज्ञ दूसरा कौन है, मैं जानता हूँ कि स्वामीके 'साथ शत्रुता करनेका परिणाम बर्बाद होना है ॥६॥ तुम्हारे स्वामी रामजी और स्वामिनी जानकीजी सरीखी हैं। वहाँ (उनके दरबारमें) तुलसीदासको तुम्हारे सिवा किसका और किस बातका सहारा है ॥७॥ विशेष १—'भिया'—यह बनारसी और मिर्जापुरी बोलीका ठेठ शब्द है। २—'खोंची'—का अर्थ शब्दार्थमें लिखा गया है। कई टीकाकारोंने इसका अर्थ 'भीख' लिखा है। पर वास्तवमें यह शब्द उक्त अर्थसे कुछ भिन्न है। ( ३४ ) अति आरत, अति स्वारथी, अति दीन-दुखारी। इनको बिलगु न मानिये, बोलहिं न बिचारी ॥१॥ लोक-रीति देखी सुनी, ब्याकुल नर-नारी। अति बरषे अनबरषे हूँ, देहिं दैवहिं गारी ॥२॥ नाकहिं आये नाथ सों, साँसति भय भारी। कहि आयो कीबी छमा, निज ओर निहारी ॥३॥