विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमै साँकरे सुमिरिये, समरथ हितकारी। सो सब विधि ऊबर करै, अपराध बिसारी ॥४॥ विगरी सेवक की सदा, साहबहिं सुधारी। तुलसी पर तेरी कृपा, निरुपाधि निनारी ॥५॥
शब्दार्थ - बिलगु = बुरा। नाकहिं = नाकोंदम। निहारी = देखकर। साँकरे = कष्टकर। ऊबर करै = उबारता या उद्धार करता है। निरुपाधि = उपाधि-रहित, विघ्न-बाधा-रहित। निनारी = स्पष्ट।
भावार्थ - अत्यन्त आर्त, अत्यन्त स्वार्थी, अति दीन और अति दुखिया, इनकी बातोंपर बुरा नहीं मानना चाहिए; क्योंकि ये सोच-विचारकर नहीं बोलते ॥१॥ लोककी यह रीति देखने और सुननेमें आयी है कि व्याकुल स्त्री-पुरुष अधिक वर्षा होनेपर और बिलकुल ही वर्षा न होनेपर दैवको गालियाँ देते हैं ॥२॥ हे नाथ, विशेष कष्ट और भयसे नाकोंदम आ जानेपर ही मैंने तुम्हें इतनी (खरी- खोटी) सुनायी है। अब तुम अपनी दयालुताकी ओर देखकर मुझे क्षमाकर दो ॥३॥ कष्टकर समयमें लोग अपने हितू और सामर्थ्यवान्का स्मरण किया करते हैं, और वह हितू सब अपराधोंको भूलकर उसकी सब प्रकारसे रक्षा करता है ॥४॥ सेवककी बिगड़ी हुई बातोंको सदैव स्वामीको ही सुधारना पड़ता है। फिर तुलसीदासपर तो तुम्हारी कृपा स्पष्ट है, उसमें किसी तरहकी विघ्न-बाधा नहीं है, यह स्पष्ट है ॥५॥
( ३५ ) कटु कहिये गाढ़े परे, सुनि समुझि सुसाँईं। करहिं अनभलेउ को भलो, अपनी भलाई ॥१॥ समरथ सुभ जो पाइये, पीर पीर-पराई। ताहि तकैं सब ज्यों नदी, वारिधि न बुलाई ॥२॥ अपने अपने को भलौ; चहैं लोग-लुगाई। भावै जो जेहि तेहि भजै, सुभ-असुभ सगाई ॥३॥ बाँह बोलिदै थापिये, जो निज बरिआई। बिन सेवा सों पालिये, सेवक की नाईं ॥४॥