विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
समै साँकरे सुमिरिये, समरथ हितकारी। सो सब विधि ऊबर करै, अपराध बिसारी ॥४॥ विगरी सेवक की सदा, साहबहिं सुधारी। तुलसी पर तेरी कृपा, निरुपाधि निनारी ॥५॥
शब्दार्थ - बिलगु = बुरा। नाकहिं = नाकोंदम। निहारी = देखकर। साँकरे = कष्टकर। ऊबर करै = उबारता या उद्धार करता है। निरुपाधि = उपाधि-रहित, विघ्न-बाधा-रहित। निनारी = स्पष्ट।
भावार्थ - अत्यन्त आर्त, अत्यन्त स्वार्थी, अति दीन और अति दुखिया, इनकी बातोंपर बुरा नहीं मानना चाहिए; क्योंकि ये सोच-विचारकर नहीं बोलते ॥१॥ लोककी यह रीति देखने और सुननेमें आयी है कि व्याकुल स्त्री-पुरुष अधिक वर्षा होनेपर और बिलकुल ही वर्षा न होनेपर दैवको गालियाँ देते हैं ॥२॥ हे नाथ, विशेष कष्ट और भयसे नाकोंदम आ जानेपर ही मैंने तुम्हें इतनी (खरी- खोटी) सुनायी है। अब तुम अपनी दयालुताकी ओर देखकर मुझे क्षमाकर दो ॥३॥ कष्टकर समयमें लोग अपने हितू और सामर्थ्यवान्का स्मरण किया करते हैं, और वह हितू सब अपराधोंको भूलकर उसकी सब प्रकारसे रक्षा करता है ॥४॥ सेवककी बिगड़ी हुई बातोंको सदैव स्वामीको ही सुधारना पड़ता है। फिर तुलसीदासपर तो तुम्हारी कृपा स्पष्ट है, उसमें किसी तरहकी विघ्न-बाधा नहीं है, यह स्पष्ट है ॥५॥
( ३५ ) कटु कहिये गाढ़े परे, सुनि समुझि सुसाँईं। करहिं अनभलेउ को भलो, अपनी भलाई ॥१॥ समरथ सुभ जो पाइये, पीर पीर-पराई। ताहि तकैं सब ज्यों नदी, वारिधि न बुलाई ॥२॥ अपने अपने को भलौ; चहैं लोग-लुगाई। भावै जो जेहि तेहि भजै, सुभ-असुभ सगाई ॥३॥ बाँह बोलिदै थापिये, जो निज बरिआई। बिन सेवा सों पालिये, सेवक की नाईं ॥४॥
६२ विनय-पत्रिका चूक चपलता मेरियै, तू बड़ो बड़ाई । होत आदरे ढीठ है, अति नीच निचाई ॥५॥ बंदिछोर विरुदावली, निगमागम गाई । नीको तुलसी दासको, तोरियै निकाई ॥६॥ शब्दार्थ—सुभ = मंगलरूप । पीर पराई = दूसरोंकी व्यथा । लोग = पुरुष । लुगाई = स्त्री (राजस्थानका शब्द है) । सगाई = सम्बन्ध । बोलिदै = बल या सहारा देकर । बरिआई = जबर्दस्ती । भावार्थ—अच्छा स्वामी सुन और समझ कर ही क्लेशके समय कठोर वचन कहा जाता है, और अच्छे स्वामी अपने स्वभावानुसार बुरे सेवकका भी भला कर देते हैं ॥१॥ यदि समर्थ, मंगलरूप और दूसरोंकी व्यथा दूर करनेमें बहादुर स्वामी मिल जाते हैं, तो उन्हें सब लोग वैसे ही देखते हैं जैसे नदी बिना बुलाये ही समुद्रकी ओर दौड़ती है (अर्थात् जैसे नदियाँ समुद्रसे मिलनेकी स्वाभाविक ही इच्छा करती हैं, वैसे ही सबलोग अच्छे स्वामीका सेवक होनेके इच्छुक होते हैं) ॥२॥ जितने स्त्री-पुरुष हैं, सब अपनी-अपनी भलाई चाहते हैं । जिसे जो अच्छा लगता है, शुभ और अशुभके सम्बन्धसे वह उसीको भजता है । तात्पर्य यह कि जो जैसी शुभ-अशुभ कामना करता है, वैसे ही देवताकी वह पूजा करता है ॥३॥ जब तुमने जबर्दस्ती अपनी भुजाओंका सहारा देकर मुझे रख लिया है, तो सेवा न करनेपर भी तुम्हें सेवकहीकी तरह उसका पालन करना चाहिये ॥४॥ भूल-चूक और चंचलता सब मेरी ही है, —तुम तो बड़े और बड़ाईके योग्य हो । आदर करनेसे नीच लोग नीचता करनेमें ढीठ हो जाते हैं ॥४॥ हे बन्दियोंको छुड़ानेवाले हनुमान्जी ! वेद और शास्त्रने तुम्हारी गुण-गाथा गायी है । तुलसी दासको केवल तुम्हारी ही अच्छाई भली है । यानी तुम दयालु हो, अतः तुलसी दासका कल्याण हो जायगा । राग गौरी ( ३६ ) मंगल-मूरति मारुत-नंदन । सकल-अमंगल-मूल-निकंदन ॥१॥ पवनतनय संतन हित-कारी । हृदय विराजत अवध-विहारी ॥२॥
विनय-पत्रिका ६३ मातु-पिता, गुरु, गनपति, सारद । सिवा-समेत संभु, सुक, नारद ॥३॥ चरन बंदि बिनवौं सब काहू । देहु रामपद-नेह-निबाहू ॥४॥ बंदौं राम-लखन-वैदेही । जे तुलसी के परम सनेही ॥५॥ शब्दार्थ—निकंदन = उखाड़नेवाला। सिवा = पार्वती। सुक = शुकदेवजी। निबाहू = निर्वाह। भावार्थ—हे पवनकुमार ! तुम मंगलमूर्त्ति हो और सब संकटोंको जड़से उखाड़ देनेवाले हो ॥१॥ हे हनुमानजी ! तुम साधु पुरुषोंका हित करनेवाले हो । तुम्हारे हृदयमें रामचन्द्रजी सदा निवास करते हैं ॥२॥ माता, पिता, गुरु, गणेश, सरस्वती, पार्वतीके सहित शिव, शुकदेव तथा नारदके ॥३॥ चरणोंकी वन्दना करके सब लोगोंसे मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि रामजीके चरणोंमें मेरा जो प्रेम है, उसका निर्वाह हो जाय ॥४॥ मैं राम, लक्ष्मण और जानकीजीकी वन्दना करता हूँ, क्योंकि ये तुलसीदासके परम स्नेही हैं ॥५॥ विशेष १—गुसाईंजीने इस पदमें हनुमानजी, माता-पिता, गुरु, गणेश, शारदा, शिवपार्वती, शुकदेव, नारदादिके चरणोंकी वन्दना करके रामपद-प्रेम माँगा है । अन्तमें उन्होंने राम-लक्ष्मण-सीताकी भी वन्दना कर सूचित किया है कि अब आगेके पदोंमें केवल लक्ष्मण, जानकी और रामकी बन्दना की जायगी । लक्ष्मण-स्तुति दण्डक ( ३७ ) लाल लाड़िले लखन, हित हौ जनके । सुमिरे संकटहारी, सकल सुमंगलकारी, पालक कृपालु अपने पनके ॥१॥
६४ विनय-पत्रिका धरनी-धरनहार भंजन-भुवनभार, अवतार साहसी सहसफन के। सत्यसंध, सत्यव्रत, परम धरमरत, निरमल करम बचन अरु मनके ॥२॥ रूप के निधान, धनु-बान पानि, तून कटि, महाबीर विदित, जितैया बड़े रन के। सेवक-सुख-दायक, सबल, सब लायक, गायक जानकीनाथ गुनगनके ॥३॥ भावते भरत के, सुमित्रा-सीता के दुलारे, चातक चतुर राम स्याम घनके। बल्लभ उर्मिला के, सुलभ सनेह बस, धनी धन तुलसी से निरधन के ॥४॥ शब्दार्थ—लड़िले = दुलारे। सहसफन = शेषनाग। तून = तरकस। घन = बादल। बल्लभ = पति। भावार्थ—हे लाड़ले लखनलाल ! तुम राम-भक्तोंका हित करनेवाले हो। याद करनेपर संकट हर लेते हो और सब तरहसे कल्याण करते हो। तुम अपनी प्रतिज्ञाको पालनेवाले तथा कृपालु हो ॥१॥ तुम पृथिवीको धारण करनेवाले तथा चौदहो भुवनोंका भार दूर करनेवाले पराक्रमी शेषनागके अवतार हो। तुम अपने प्रण और व्रतको सत्य करनेवाले, धर्ममें अत्यन्त रत तथा निर्मल मन, वचन और कर्मवाले हो ॥२॥ तुम सुन्दरताके घर हो, हाथमें धनुष-बाण लिये रहते हो, कमरमें तरकस कसे रहते हो, विख्यात महायोद्धा हो और बड़े-बड़े युद्धोंमें विजय-लाभ करनेवाले हो॥ तुम सेवकोंको सुख देनेवाले, महा बलवान्, हर प्रकारसे योग्य तथा जानकीनाथके गुणोंका गान करनेवाले हो ॥३॥ तुम भरतजीके प्रिय, सुमित्रा और सीताजीके दुलारे तथा रामरूपी श्यामघनके चतुर चातक हो। तुम महारानी उर्मिलाके पति हो, प्रेमसे सहजमें मिलनेवाले हो और तुलसीदास-जैसे निर्धनको राम-पद-प्रेमरूपी धन देनेके लिए बड़े धनी हो ॥४॥
विनय-पत्रिका ६५ विशेष १—'धरनी-धरनहार—लक्ष्मणजी शेषावतार हैं। पुराणोंमें लिखा है कि यह पृथिवी वासुकिनागके फनपर स्थित है। इसीसे लक्ष्मणजीको 'धरनी-धरन- हार' कहा गया है। २—'रूपके निधान'—इनकी सुन्दरताके सम्बन्धमें लिखा है:— कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे। भरत रामहीकी अनुहारी। सहसा लखि न सकहि नर-नारी ॥ लखन सत्रुसूदन इक रूपा। नख सिखतें सब अंग अनूपा। मनभावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहँ त्रिभुवन कोउ नाहीं ॥ —रामचरितमानस ! राग घनाश्री ( ३८ ) जयति लछमनानंत भगवंत भूधर, भुजग- राज भुवनेस, भूभारहारी। प्रलय-पावक-महाज्वालमाला-वमन, समन-संताप लीलावतारि ॥१॥ जयति दासरथि, समर-समरथ, सुमित्रा- सुवन, सत्रुसूदन, राम-भरत बंधो। चारु-चंपक-वरन वसन-भूषन-धरन, दिव्यतर, भव्य, लावन्य-सिन्धो ॥२॥ जयति गाधेय-गौतम-जनक-सुख-जनक, विस्व-कंटक-कुटिल-कोटि-हंता। वचन-चय-चातुरी-परसुधर-गरब-हर, सर्वदा राम भद्रानुगंता ॥३॥ जयति सीतेस-सेवा सरस, विषय रस- निरस, निरुपाधि धुरधर्मधारी। ५
६६ विनय-पत्रिका विपुलबलमूल सार्दूल विक्रम जलद- नाद-मर्दन, महाबीर भारी ॥४॥ जयति संग्राम-सागर-भयंकर-तरन, रामहित-करन वरबाहु-सेतू। उर्मिला-रवन, कल्याण-मंगल-भवन, दास तुलसी-दोष-दवन-हेतू ॥५॥ शब्दार्थ— ज्वालमाला = लपटें । वमन = उगलना । दासरथि = दशरथके पुत्र । गाधेय = गाधिके पुत्र विश्वामित्र । जनक = उत्पन्न करनेवाले । कंटक = काँटा । कुटिल = दुष्ट । चय = समूह । परसुधर = परशुराम । भद्र = कल्याणरूप । अनुगंता = पीछे-पीछे चलनेवाले । सरस = रत । निरस = उदासीन । सार्दूल = सिंह । तरन = पार करनेवाले । भावार्थ—जय हो ! हे लक्ष्मणजी, आप अनन्त, ऐश्वर्यवान् , पृथिवीको धारण करनेवाले शेषनाग, समस्त संसारके स्वामी, पृथिवीका भार उतारनेवाले, प्रलयकालकी अग्निकी विकराल लपटें उगलनेवाले तथा लीलापूर्वक अवतार लेकर संसारके दुःखोंका नाश करनेवाले हैं ॥१॥ हे दशरथके पुत्र लक्ष्मणजी ! आपकी जय हो । आप युद्धमें समर्थ, सुमित्राके पुत्र, शत्रुघ्न, राम और भरतके भाई हैं । हे सौन्दर्यके समुद्र लक्ष्मणजी ! आपके सुन्दर शरीरका रंग चम्पा-पुष्पके समान है; आप अत्यन्त दिव्य वस्त्र और आभूषण धारण किये रहते हैं ॥२॥ आपकी जय हो ! आप विश्वामित्र, गौतम, महाराज जनकको आनन्द देनेवाले, संसारके कंटकस्वरूप करोड़ों कुटिलोंका हनन करनेवाले, चातुरीपूर्ण बातोंसे ही परशुरामजीका गर्व हरनेवाले तथा सर्वदा कल्याणरूप रामजीके पीछे-पीछे चलने- वाले हैं ॥३॥ जय हो ! आप रामचन्द्रजीकी सेवामें रत तथा विषय-रससे उदा- सीन रहनेवाले, उपाधि-रहित या कामना-रहित धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, अपार बलके मूल स्थान, सिंहवत् पराक्रमवाले, मेघनादका मर्दन करनेवाले तथा बहुत बड़े महावीर हैं ॥४॥ जय हो ! आप भयंकर युद्धरूपी समुद्रको पार करने- वाले, रामजीकी भलाई करनेके लिए आपकी श्रेष्ठ भुजाएँ पुलस्वरूप हैं। हे उर्मिलानाथ ! आप कल्याण और मंगलके घर हैं तथा तुलसीदासके दोषोंको नाश करनेके मुख्य कारण हैं। ॥५॥
विनय-पत्रिका ६७ विशेष १—'गाधेय गौतम···जनक'—लक्ष्मणजीने सुबाहु आदि राक्षसोंको मार- कर विश्वामित्रको, रामचन्द्र द्वारा अहल्याको शापमुक्त कराकर गौतमको तथा जनकपुरमें धनुष-यज्ञके समय निराश महाराज जनकको साहस देकर आनन्द प्रदान किया था। २—सीतेस सेवा···निरस'—लक्ष्मणजी भगवान् रामचन्द्रकी सेवामें इस प्रकार तल्लीन रहते थे कि उन्होंने संसारमें और किसीको कुछ समझा ही नहीं। उन्होंने वनवासके समय १४ वर्षतक अखंड ब्रह्मचर्य निभाया था। विषय- वासनाओंसे वह किस प्रकार उदासीन रहते थे, उनमें कितनी अपूर्व निष्ठा थी, इसका मुख्य प्रमाण नीचेकी कथा है— मेघनादको वर था कि जो आदमी बारह वर्ष अन्न, नींद और स्त्री-प्रसंग त्याग किये रहेगा, वही उसका वध कर सकेगा। उसने इस वरदानकी बात अपनी स्त्री सुलोचनासे कही थी। अतः जब उसकी कटी हुई भुजा सुलोचनाके सामने आकर गिरी, तब उसने विलापके साथ कहा, यह क्या हो गया ? उस समय मेघनादकी भुजाने लिख दिया कि मेरा वध लक्ष्मणजीने किया है। वह अगणित वर्षतक ब्रह्मचर्यका पालन कर चुके हैं। उनकी महिमाका वर्णन करना शेष और शारदाके लिए भी असम्भव है। भरत-स्तुति ( ३९ ) जयति भूमिजारमन-पदकंज-मकरंद-रस-रसिक-मधुकर भरत भूरिभागी भुवन-भूषन-भानु-बंस-भूषन, भूमेपालमनि रामचन्द्रानुरागी ॥१॥ जयति विबुधेस-धनदादि दुर्लभ महाराज-सम्राज-सुख-प्रद-विरागी। खङ्ग-धाराव्रती-प्रथम रेखा प्रगट सुद्धमति-जुवति पति-प्रेमपागी ॥२॥ जयति निरुपाधि भक्तिभाव-जंत्रित-हृदय,बंधु-हित चित्रकूटाद्रि-चारी पादुका नृप-सचिव-पुहुमि-पालक परम धरम-धुर-धीर बरवीर भारी३
६८ विनय-पत्रिका जयति संजीवनी-समय-संकट हनूमान धनुवान-महिमा बखानी । बाहुबल विपुल परमिति पराक्रम अतुल, गूढ़ गति जानकी-जान जानी जयति-रन-अजिर गंधर्व-गन-गर्वहर फिर किये राम गुनगाथ-गाता । मांडवी-चित्त-चातक-नवांबुद-वरन, सरन तुलसीदास अभय-दाता ॥५॥ शब्दार्थ—भूरि = बहुत । विबुधेश = इन्द्र । धनदादि = कुबेर इत्यादि । महाराज सम्राज = महासाम्राज्य । प्रेमगामी = तल्लीन । जंत्रित = वशीभूत । चित्रकूटद्रि (चित्रकूट+ अद्रि) = चित्रकूट पर्वत । पादुका = खड़ाऊँ । पुहुमि = पृथिवी । परमिति = प्रमाण जानकी- जान = रामचन्द्र । रन-अजिर = रणांगण, युद्धभूमि । गाता = गानेवाला, गायक । मांडवी = भरतजीकी अर्द्धाङ्गिनी । नवांबुद (नव+अम्बुद) = नवीन मेघ । भावार्थ—श्रीरामजीके चरणारविन्दोंका मकरन्द पान करनेके रसिक भ्रमर तथा अत्यन्त भाग्यशाली भरतलालकी जय हो ! आप संसारके भूषणस्वरूप सूर्य- वंशके आभूषण हैं, और राजाओंमें शिरोमणि रामचन्द्रजीके प्रेमी हैं ॥१॥ आपकी जय हो ! आपने ऐसे सुखप्रद महासाम्राज्यको छोड़ दिया, जो इन्द्र और कुबेर आदिके लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है। आप तलवारकी धारके समान व्रतो महात्मा ओं- में सर्वश्रेष्ठ समझे जाते हैं, और आपकी शुद्ध बुद्धि-रूपी युवती स्त्री रामरूपी पतिके प्रेममें तल्लीन है ॥२॥ आपकी जय हो ! आप निष्काम भक्तिभावके वशी- भूत हृदयसे प्रिय भाई रामचन्द्रके लिए चित्रकूट पर्वतपर पैदल गये, रामजीके पादुका-रूपी राजाके मंत्री बनकर पृथिवीका पालन करते रहे तथा परमधर्मके धुरीको धारण करनेवाले एवं बड़े भारी वीर हैं ॥३॥ जय हो ! संजीवनी बूटी लाते समय संकट आनेपर हनुमान्जीने आपके धनुषबाणकी महिमाका बखान किया था, आपके बाहुबलकी अधिकता और अतुलित पराक्रमका यही प्रधान प्रमाण है। आपकी गूढ़गति केवल जानकी-वल्लभ रामजी जानते हैं ॥४॥ आप युद्ध-स्थानमें गन्धर्वोंका गर्व हरनेवाले तथा फिरसे उन्हें भी रामजीकी गुणावलीके गायक बनानेवाले हैं। आप महारानी मांडवीके चित्त-चातकके लिए नवीन मेघवर्ण हैं और शरणागत तुलसीदासको अभयदान देनेवाले हैं। आपकी जय हो ! विशेष १—'पादुका नृप सचिव'—भरतजी प्रतिदिन श्रीरामजीकी पादुकाका
विनय-पत्रिका ६९ पूजन करते थे और जबतक रामजी वनवास समाप्त करके अयोध्यापुरीमें नहीं आये तबतक उस पादुकासे आज्ञा लेकर मन्त्रीकी भाँति राज्यकार्य करते रहे। २—'संजीवनी-समय-संकट'—हनुमान्जी मूर्च्छित लक्ष्मणजीके लिए संजीवनी बूटी लेकर आकाश मार्गसे लौट रहे थे। भरतजीने उन्हें देखकर यह अनुमान किया कि कोई मायावी राक्षस जा रहा है। इसलिए उन्होंने हनुमान्- जीपर एक बाण चला दिया। बाण लगते ही वह 'हा राम ! हा राम !' कहते हुए जमीनपर गिर पड़े। राम शब्द सुनते ही भरतजीको बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने सोचा कि यह तो राक्षस नहीं, कोई रामभक्त है। अतः तुरन्त ही उन्होंने दौड़कर हनुमान्जीको उठाकर हृदयसे लगा लिया। उसी समय हनुमान्जीने उनके बाणकी महिमा कही थी। ३—'गूढ़गति...जानी'—इस विषयमें जनकजीने महारानी सुनयनासे कहा है :— भरत महामहिमा सुनु रानी। जानहिं राम न सकहिं बखानी ॥ (रामचरितमानस) ४—'गन्धर्व गन गर्वहर'—एक बार गन्धर्वोंने भरतजीके ननिहाल केकय देशपर जिसे आजकल कश्मोर कहते हैं—आक्रमण किया था। भरतजीने जाकर उन्हें हराया और उन गन्धर्वोंको—जो कि रामचन्द्रजीके विमुख थे—रामगुण- गायक बना दिया। शत्रुघ्न-स्तुति राग धनाश्री ( ४० ) जयति जय सत्रु-करि-केसरी सत्रुहन, सत्रुतम-तुहिनहर किरनकेतू। देव-महिदेव-महि-धेनु-सेवक सुजन-सिद्ध-मुनि-सकल-कल्यान-हेतू ॥१॥ जयति सर्वांग सुन्दर सुमित्रा-सुवन, भुवन विख्यात-भरतानुगामी। वर्म चर्म्मासि-धनु-बान-तूनीर-धर सत्रु-संकट-समन यत्प्रनामी ॥२॥
७० विनय-पत्रिका जयति लवनाम्बुनिधि-कुंभ-संभव महादनुज-दुर्जन दवन, दुरितहारी । लक्ष्मणानुज, भरत-राम-सीता-चरन-रेनु-भूषित-भाल-तिलकधारी॥३॥ जयति श्रुतिकीर्त्ति-वल्लभ सुदुर्लभ सुलभ नमत नर्मद भुक्ति मुक्तिदाता दास तुलसी चरन-सरन सीदत विभो पाहि दीनार्त्त-संताप-हाता॥४॥ शब्दार्थ—करि = हाथी। किरन-केतू = किरणोंकी ध्वजा यानी सूर्य। महिदेव = ब्राह्मण। वर्म = कवच। चर्मासि = (चर्म+असि) ढाल और तलवार। लवनाम्बुनिधि = (लवण+ अम्बुनिधि) लवणासुररूपी समुद्र। कुंभ संभव = अगस्त्य। दुरित = पाप। श्रुतिकीर्त्ति = शत्रुघ्न- जीकी स्त्री। नर्मद = सुखदाता। सीदत = दुःख पा रहा है। भावार्थ—शत्रुरूपी हाथियोंका नाश करनेके लिए सिंहवत् शत्रुघ्नजीकी जय हो, जय हो ! आप शत्रुरूपी अन्धकार और पालेका हरण करनेके लिए साक्षात् सूर्य हैं। आप देवता, ब्राह्मण, पृथिवी, गऊ, भक्त, संत, सिद्ध और मुनियोंका कल्याण करनेवाले हैं। ॥१॥ आपका अंग-प्रत्यंग सुन्दर है; आप सुमित्राके पुत्र हैं और भरतजीकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं यह बात जगत् विख्यात है। जय हो ! आप कवच, ढाल, तलवार, धनुष, बाण और तरकस धारण करनेवाले तथा शत्रुओं द्वारा आये हुए संकटका नाश करके उनसे प्रणाम करानेवाले या उन्हें अपने पैरोंपर गिरानेवाले हैं ॥२॥ आप लवणासुररूपी समुद्रको पान कर जानेवाले अगस्त्यके समान हैं। आप बड़े-बड़े राक्षसों और दुष्टोंका संहार करनेवाले तथा पापोंका हरण करनेवाले हैं। आपकी जय हो ! आप लक्ष्मण- जीके छोटे भाई तथा भरत, राम और सीताकी चरण-रजका तिलक अपने सुन्दर मस्तकपर धारण करनेवाले हैं ॥३॥ हे श्रुतिकीर्ति-वल्लभ ! आपकी जय हो । आप ईश्वर-विमुखोंके लिए दुर्लभ और भक्तोंके लिए सुलभ हैं, प्रणाम करते ही सुख देनेवाले तथा भोगैश्वर्य और मुक्ति देनेवाले हैं। हे विभो ! तुलसीदास आपके चरणोंकी शरणमें आनेपर दुःख पा रहा है। हे दीनों और आर्त्तोंका दुःख दूर करनेवाले शत्रुघ्नजी मेरी रक्षा कीजिये ॥४॥ विशेष १—लवणासुर मथुराका राजा था। इसके अत्याचारोंसे गो-ब्राह्मण तथा संत-महात्मा तंग आ गये थे। शत्रुघ्नने उसका वध करनेके लिए रामचन्द्रजीसे
विनय-पत्रिका ७१ आज्ञा माँगी, आज्ञा पाते ही उन्होंने मथुरामें जाकर उसका वध करके प्रजाकी दुश्चिन्ता दूर कर दी। २—‘यत्प्रणामी' श्री वियोगीहरिने इसका अर्थ किया है ‘उस शत्रुघ्नजीको मैं प्रणाम करता हूँ।' किन्तु इसका शाब्दिक अर्थ है ‘जिसमें प्रणाम करनेकी क्षमता हो'। जैसे नाम और नामी हैं, वैसे ही प्रणाम और प्रणामी है। श्रीसीता-स्तुति राग-केदारा (४१) कबहुँक अंब, अवसर पाइ। मेरिऔ सुधि द्याइबी, कछु करुन-कथा चलाइ ॥ १ ॥ दीन, सब अँगहीन, छीन, मलीन, अघी अघाइ। नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ ॥ २ ॥ बूझिहैं ‘सो है कौन', कहिबी नाम दसा जनाइ। सुनत राम कृपालु के मेरी बिगरिऔ बनि जाइ ॥ ३ ॥ जानकी जगजननि जन की किये बचन सहाइँ। तरै तुलसीदास भव तव नाथ-गुन-गन गाइ ॥ ४ ॥ शब्दार्थ—अंब = माता। द्याइबी = दिलाना। अघी = पापी। अघाइ = परिपूर्ण। विगरिऔ = बिगड़ी हुई बात भी। जन = दास। तव = तुम्हारे। भावार्थ—हे माता, कभी अवसर मिलनेपर कुछ कारुणिक बात चलाकर प्रभुजीको मेरी भी याद दिलाना ॥१॥ कहना, एक दीन, सर्व साधनोंसे रहित, कृश, मलिन और पूरा पापी मनुष्य अपनेको आपकी दासी (तुलसी) का दास (तुलसीदास) कहलाकर आपका नाम लेकर यानी आपका भक्त बननेका ढोंग रचकर पेट भरता है ॥२॥ किन्तु यदि प्रभुजी पूछें कि वह कौन है, तब तुम मेरा नाम और (ऊपर कहे अनुसार) मेरी दशा उन्हें बताना। कृपालु प्रभुजीके इतना सुन लेनेसे ही मेरी बिगड़ी हुई बात भी बन जायगी ॥३॥ हे जगज्जननी
७२ विनय-पत्रिका जानकीजी! यदि आप इस दासकी वचन द्वारा इतनी सहायता कर देंगी, तो तुलसीदास आपके स्वामीकी गुण-गाथा गा-गाकर भव-सागरसे पार हो जायगा — तर जायगा ॥४॥ विशेष १—'किये वचन सहाइ'—में गोस्वामीजीका गूढ़ रहस्य भरा हुआ है। वास्तवमें महारानीजीके कहनेमात्रसे ही मनुष्यको परमात्माकी समीपता प्राप्त हो जाती है। क्योंकि वह किसीके सम्बन्धमें श्रीरामजीसे तभी कहेंगी, जब उनमें उसके प्रति दया उत्पन्न होगी, और उनमें दया उत्पन्न होनेपर श्रीरामजी- के हृदयमें दया उत्पन्न होना स्वाभाविक है। कारण यह कि श्रीसीता और रामका अभेदसम्बन्ध है। देखिये:— गिरा अरथ जल बीचि सम, कहियत भिन्न न भिन्न । बंदौं सीताराम पद, जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न ॥ —रामचरितमानस । इस पदमें करुण-रसकी अपूर्व और अटूट धारा है। ( ४२ ) कवहूँ समय सुधि द्याइबो, मेरी मातु जानकी जन कहाइ नाम लेत हौं किये पन चातक ज्यों, प्यास प्रेम-पान को ॥१॥ सरल प्रकृति आपु जानिये करुना निधान की । जिन गुन, अरिकृत अनहितौ,दास-दोष सुरति चित रहत न दिये दानकी बानि बिसारनसील है मानद अमान की। तुलसीदास न बिसारिये, मन करम बचन जाके,सपनेहुँ गति न आनकी॥ शब्दार्थ — अरिकृत = शत्रु द्वारा किया हुआ। अनहितौ = अनिष्ट भी। सुरति = स्मरण। बिसारनसील = भूलनेकी। मानद = मान देनेवाले। अमान = निरादर । भावार्थ — हे मातेश्वरी जानकी, कभी समय पाकर भगवान्को मेरी सुध कराना। मैं चातककी भाँति प्रणपूर्वक उनका दास कहाकर उनका नाम जप रहा हूँ। मुझे उनका प्रेम-रस पीनेकी प्यास है ॥१॥ करुणा-निधान श्रीराम- जीके सरल स्वभावको आप जानती हैं। उन्हें अपना गुण, सेवकका अपराध दिये हुए दान तथा शत्रु द्वारा किये हुए अनिष्टोंका भी स्मरण नहीं रहता ॥२॥
विनय-पत्रिका ७३ उनकी आदत ही भूल जानेकी है। जो प्राणी कहीं भी सम्मान नहीं पाता, उसे भी वह मान दिया करते हैं। जिस तुलसीदासको मन, वचन और कर्मसे स्वप्नमें भी दूसरेका सहारा नहीं है, उसे वह (अपने भुलक्कड़ स्वभावानुसार) भूल न जायँ ॥३॥ विशेष १—'अनहितौ'—इस शब्दमें कविने भगवान्के करुणानिधानत्वकी सार्थकता दिखलायी है। इसीसे उसने इसपर विशेष जोर देनेके लिए 'अरिकृत अनहितौ' यानी 'शत्रु द्वारा किये हुए अनिष्टोंको भी' लिखा है। 'भी' से सूचित हो रहा है कि और बातोंका भूल जाना तो साधारण बात है, पर शत्रु द्वारा किये हुए अनिष्टोंको भूल जाना कारुणिकताकी पराकाष्ठा है। श्रीराम-स्तुति ( ४३ ) जयति सच्चिद्व्यापकानन्द परब्रह्म-पद, विग्रह-व्यक्त लीलावतारी। विकल ब्रह्मादिसुर सिद्ध संकोचबस, विमल गुन-गेह नर-देह-धारी ॥१॥ जयति कोसलाधीस-कल्यान कोसलसुता, कुसल कैवल्य-फल चारुचारी वेद बोधित करम-धरम-धरनी-धेनु, विप्र सेवक साधु-मोदकारी ॥२॥ जयति ऋषि-मखपाल, समन सज्जन-साल, सापबस मुनि-वधू पापहारी। भंजि भव-चाप, दलि दाप भूपावली, सहित भृगुनाथ नतमाथ भारी॥३ जयति धारमिक-धुर, धीर रघुवीर गुरु-मातु-पितु-बंधु-वचनानुसारी। चित्रकूटाद्रि विन्ध्याद्रि दंडक विपिन, धन्यकृत पुन्यकानन बिहारी ४ जयति पाकारिसुत-काक करतूति-फलदानि खनि गर्त्त गोपित विराधा दिव्य देवी वेष देखि लखि निसिचरी जनु विडंबित करी विस्ववाधा५ जयति खर-त्रिसिर-दूषन चतुर्दस-सहस-सुभट-मारीच-संहारकर्त्ता। गृध्र-सवरी-भगति-विवस करुनासिंधु, चरित निरुपाधि, त्रिविधार्त्तिहर्त्ता जयति मद-अंध कुकबंध वधि, वालि बलसालि बधि, करन सुग्रीव राजा सुभट मर्कट भालु-कटक संघट सजत, नमत पद रावनानुज निवाजा॥७
७४ विनय-पत्रिका जयति पाथोधि-कृत-सेतु कौतुक हेतु, काल-मन-अगम लइ ललकि लंका सकुल, सानुज, सदल दलित दसकंठ रन, लोक-लोकप किये रहित-संका जयति सौमित्रि-सीता-सचिव-सहित चले पुष्पकारूढ़ निज राजधानी। दास तुलसी मुदित अवधवासी सकल, राम भे भूप वैदेहि रानी ॥९॥ शब्दार्थ—व्यक्त = प्रकट। कोसलाधीस = दशरथ। कोसलसुता = कौशल्या। बोधित = विहित। मखपाल = यज्ञकी रक्षा करनेवाले। साल = पीड़ा देनेवाले, चुभनेवाले। पाकारिसुत = इन्द्रका पुत्र जयन्त। काक = कौआ। खानि = खोदकर। विराधा (विराध) = एक राक्षस। मर्कट = बन्दर। कटक = सेना। सजत = सुसज्जित करना। निवाजा = निहाल किया। ललकि = धुनमें आकर। सकुल = कुलके सहित। वैदेहि = जानकीजी। भावार्थ—सत्, चित्, व्यापक और आनन्दस्वरूप परब्रह्म उपाधिधारी श्री रामजीकी जय हो ! आपने लीला करनेके लिए ही व्यक्त अर्थात् साकार शरीरमें अवतार लिया है। आप व्याकुल ब्रह्मा आदि देवताओं तथा सिद्धोंके संकोचवश विशुद्ध गुणविशिष्ट मानव-शरीर धारण करनेवाले हैं ॥१॥ आपकी जय हो ! आप महाराज दशरथके कल्याणार्थ तथा महारानी कौशल्याकी कुशलके लिए मोक्षके सुन्दर चार फल हैं। (अर्थात् राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चारों भाई सारूप्य, सामीप्य, सायुज्य और सालोक्य मुक्तियोंके रूपमें उत्पन्न हुए हैं।) आप वेद-विहित धर्म-कर्म तथा पृथिवी, गो, ब्राह्मणके सेवकों और साधुओंको आनन्दित करनेवाले हैं ॥२॥ आपकी जय हो ! आप ब्रह्मर्षि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेवाले, साधु-महात्माओंके पीड़कोंका नाश करनेवाले तथा शापके कारण पत्थरके रूपमें पड़ी हुई गौतम-पत्नी अहिल्याको पापमुक्त करनेवाले हैं। आप शिवजीके धनुषको तोड़कर राजाओंके दर्पको चूर्ण करनेके साथ ही परशुरामके उन्नत मस्तकको नीचे झुकानेवाले हैं ॥३॥ आपकी जय हो ! आप गुरु, माता, पिता और भाईके वचन माननेवाले, धार्मिकताके धुरा, धीर और रघुकुलमें असाधारण वीर हैं। आपने चित्रकूटपर्वत और विन्ध्य पर्वतको धन्य कर दिया है और दंडक वनमें विहार करके उसे पुनीत बना दिया है ॥४॥ हे काकवेशी इन्द्रके पुत्र जयन्तको उसकी करनीका फल देनेवाले, गड्ढा खोदकर विराध राक्षसको गाड़नेवाले तथा दिव्य देवीके वेषमें सूपर्णखाको देखते ही पहचानकर मानो संसारके बाधास्वरूप रावणको अपमानित करनेवाले (सूपर्णखा-
विनय-पत्रिका ७५ की नाक और कान काटनेवाले) श्रीरामचन्द्रजी ! आपकी जय हो ! ॥५॥ आप खर, त्रिशिरा, दूषण, उनकी चौदह हजार सेना तथा मारीचके संहारकर्त्ता हैं। आप गृद्ध और शबरीकी भक्तिके वशमें हो जानेवाले, करुणाके समुद्र, निष्कलंक चरित्रवाले तथा तीन प्रकारके (दैहिक, दैविक, भौतिक) दुःखोंको हरनेवाले हैं ॥६॥ आपकी जय हो ! आपने मदान्ध और दुष्ट कबन्धको मारा तथा महाबलवान् बालिका वध करके सुग्रीवको राजा बनाया। आपने अच्छे-अच्छे योद्धा बन्दरों और रीछोंकी सेना संघटित करके सजायी और पैरोंपर गिरते ही विभीषणको निहाल कर दिया ॥७॥ जय हो ! आपने लीलाके ही लिए समुद्रपर पुलका निर्माण किया, जो लंकापुरी कालके मनके लिए भी अगम थी, उसे आप धुनमें आकर ले बीते और कुल-सहित, भाई-सहित और दल-बल-सहित रावणको रणभूमिमें कुचलकर तीनों लोकों एवं इन्द्र-कुबेरादि लोकपालोंको निःशंक कर दिया ॥८॥ श्रीरामजीकी जय हो ! (उसके बाद) आप लक्ष्मण, सीता और सुग्रीव हनुमान् आदि मंत्रियों-सहित पुष्पक विमानपर बैठकर अपनी राजधानी अयोध्या- को चले। तुलसीदास कहते हैं कि रामचन्द्रजीके राजा होनेपर तथा सीताजीके रानी होनेपर समस्त अयोध्यानिवासी आह्लादित हो गये ॥९॥ विशेष १—गुसाईंजीने इस पदमें रामावतारके चरित्रका आद्योपान्त स्मरण किया है। यहाँ रामावतारकी एक भी मुख्य घटना छूटने नहीं पायी है। २—'ऋषि-मखपाल'—विश्वामित्रके आश्रमके पास राक्षसोंने इतना उत्पात मचा रखा था कि वह बेचारे निर्विघ्न तपस्या ही नहीं करने पाते थे। अतः वह यज्ञकी रक्षाके लिए राम-लक्ष्मणको अयोध्यासे अपने आश्रममें ले गये। रामजी- ने लक्ष्मणको साथ लेकर मुनिके यज्ञकी रक्षा की और बहुत-से उत्पाती राक्षसों- को मार डाला। ३—'मुनिवधू पापहारी'—परम सुन्दरी अहिल्या गौतम ऋषिकी स्त्री थी। एक दिन सन्ध्याके समय जब कि गौतम ऋषि सन्ध्यावन्दनके निमित्त बाहर गये थे, देवराज इन्द्र गौतमका रूप धारण करके अहिल्याके पास पहुँचा। वह उसके सौन्दर्यपर मुग्ध था। उसके रतिदान माँगनेपर पहले तो अहिल्याने
७६ विनय-पत्रिका कुसमय समझकर अस्वीकार कर दिया, पर पातिव्रत धर्म समझकर पीछे उसे उसके प्रस्तावसे सहमत होना पड़ा। सम्भोगके बाद ही गौतम ऋषि आ गये। उन्होंने योगबलसे सब रहस्य जान लिया और क्रुद्ध होकर इन्द्रको शाप दिया कि तेरे एक सहस्र भग हो जायँ, तथा अहिल्याको शाप दिया कि तू पत्थर हो जा। पश्चात् जब उनका क्रोध शान्त हुआ तो उन्होंने दोनोंके शापका प्रतिकार बतलाया। कहा, जब श्रीरामजी शिव-धनुषको तोड़ेंगे, तब इन्द्रके सहस्र भग सहस्र-नेत्रोंके रूपमें परिणत हो जायँगे और श्रीरामजीके चरणस्पर्शसे अहिल्या- का उद्धार हो जायगा। ४—'भृगुनाथ नतमाथ'—रामजीके धनुष तोड़नेपर परशुरामने आकर बहुत क्रोध किया था। उन्हें अपने बल-वीर्यका बड़ा घमण्ड था। उन्होंने इक्कीस बार क्षत्रिय राजाओंको जीतकर समूची पृथिवीका दान कर दिया था। किन्तु रामजीके सामने अन्तमें उन्हें भी सिर झुकाना पड़ा था। ५—'पाकारिसुत'—इन्द्रका पुत्र जयन्त कौएका वेष धारण करके श्रीरामजीका बल देखने आया और सीताके चरणोंमें चोंच मारकर भागा। श्रीरामजीने सींकका धनुष-बाण बनाकर उसे मारा। उसने नकली वेष धारण किया था, इसलिए श्रीरामजीने उसपर नकली बाण चलाकर ही अपने बाणके प्रभुत्वका दिग्दर्शन कराना उचित समझा। अभागा जयन्त व्याकुल होकर भागने लगा, पर जब पीछे फिरकर देखता तो बाण उसके पीछे लगा रहता। ब्रह्मलोक, शिवलोक, इन्द्रपुर तथा और तमाम लोकोंमें घूम आया, किन्तु कहीं उसे शरण न मिली। अन्तमें उसे श्रीरामजीकी शरण लेनी पड़ी। भगवान्को दया आ गयी, अतः उन्होंने उसके प्राण नहीं लिये, केवल एकाक्ष करके छोड़ दिया। कहते हैं तभीसे कौओंके एक ही पुतली होती है। ६—विराध और कबन्ध ये दोनों राक्षस थे। भगवान्ने इनका वध किया था। ७—'दिव्य देवी वेष देखि लखि निसिचरी'—में 'देखि' 'लखि' ये दोनों शब्द एक ही अर्थके बोधक होनेके कारण पुनरुक्तिसे दूषित दिखाई पड़ते हैं; किन्तु यहाँ पुनरुक्ति-दोष नहीं है। देखना, बाह्य चक्षुका विषय है और 'लखने' में मनश्चक्षुके विषयकी झलक है। श्रीरामजीने सूपर्णखाको देवी रूपमें देखा,
विनय-पत्रिका ७७ इसके लिए तो कविने देखि लिखा और यह देवी नहीं सूपर्णखा राक्षसी है, यह जान लिया, इसके लिए उन्होंने 'लखि' शब्दका प्रयोग किया । ८—'करुना'—भक्तवर बैजनाथजीने 'करुणा'के सम्बन्धमें लिखा है:— सेवक दुखतें दुखित है, स्वामि विकल है जाइ। दुःख निवारे सीघ्र ही, 'करुना' गुन सों आइ ॥ ( ४४ ) जयति राज-राजेन्द्र राजीवलोचन, राम, नाम कलि-कामतरु, साम साली। अनय-अंभोधि-कुंभज, निसाचर-निकर- तिमिर घनघोर खर किरनमाली ॥१॥ जयति मुनिदेव नरदेव दशरथके, देव-मुनिवंद्य किय अवध-वासी। लोकनायक-कोक-सोक-संकट-समन, भानुकुल-कमल-कानन - विकासी ॥२॥ जयति सिंगार-सर तामरस-दामदुति- देह, गुनगेह, विस्वोपकारी। सकल सौभाग्य-सौंदर्य सुषमारूप, मनोभव कोटि गर्वापहारी ॥३॥ जयति सुभग सारंग सुनिषंग सायक सक्ति, चारु चर्मासि वर वर्मधारी। धर्मधुरधीर, रघुवीर, भुज-बल अतुल, हेलया दलित भूभार भारी ॥४॥ जयति कलधौत मनि-मुकुट, कुंडल, तिलक, झलक भलिभाल, विधु-वदन-सोभा। दिव्य भूषन, वसन पीत, उपवीत, किय ध्यान कल्यान-भाजन न को भा ॥५॥
७८ विनय-पत्रिका जयति भरत-सौमित्रि-सत्रुघ्न-सेवित, सुमुख, सचिव-सेवक-सुखद, सर्वदाता। अधम, आरत, दीन, पतित, पातक-पीन सकृत नतमात्र कहि 'पाहि' पाता ॥६॥ जयति जय भुवन दसचारि जस जगमगत, पुन्यमय, धन्य जय राम राजा। चरित-सुरसरित कवि-मुख्य गिरि निःसरित, पिवत, मज्जत मुदित सँत-समाजा ॥७॥ जयति वर्णाश्रमाचारपर नारि-नर, सत्य - सम-दम-दया-दानसीला। विगत दुख - दोष, संतोष सुख सर्वदा, सुनत, गावत राम राजलीला ॥८॥ जयति वैराग्य-विज्ञान-वारांनिधे, नमत नर्मद, पाप-ताप-हर्त्ता। दास तुलसी चरन सरन संसय-हरन, देहि अवलंब वैदेहि-भर्त्ता ॥९॥ शब्दार्थ—राजीवलोचन = कमलनेत्र । अनय = अनीति । निकर = समूह । खर = तीक्ष्ण । कोक = चकवा । तामरस = कमल । दाम = माला । मनोभव = कामदेव । सारंग = धनुष । सुनिषंग = सुन्दर तरकस । हेलया = लीलापूर्वक । कलधौत = सुवर्ण । को = कौन । भा = हुआ । पीन = मोटा, पुष्ट । पाता = उद्धार करनेवाले । कविमुख्य = मुख्य कवि यानी आदिकवि महर्षि बाल्मीकि । दानसीला = दानी स्वभाववाले । वारांनिधे = समुद्र । नर्मद = आनन्ददाता । भावार्थ—हे श्रीरामजी ! आपकी जय हो ! आप राजराजेश्वरोंमें इन्द्र हैं, आप कमलनेत्र हैं, आपका नाम 'राम' कलियुगके लिए कल्पवृक्ष है, आप साम्य भाव रखनेवाले, अनीतिरूपी समुद्रको सोख जानेके लिए अगस्त्य हैं और दानव- दल-रूपी सघनान्धकारका नाश करनेके लिए मध्याह्नकालीन सूर्य हैं ॥१॥ हे मुनि, देवता और मनुष्योंके स्वामी दशरथ-लला ! आपकी जय हो ! आपने अपनी विभूतिसे अवधवासियोंको ऐसा बना दिया कि देवता और मुनि भी
विनय-पत्रिका ७९ उनकी वन्दना करने लगे। आप लोकपाल-रूपी चक्रवाकोंके शोक-सन्तापका नाश करनेवाले तथा सूर्यवंश-रूपी कमल-वनको विकसित करनेवाले हैं ॥२॥ जय हो ! आपके शरीरकी शोभा शृंगार-रूपी सरोवरमें उत्पन्न हुए नीले कमलों- की आभाके समान है। आप गुणोंके धाम हैं और संसारका उपकार करनेवाले तथा सब प्रकारके सौभाग्य, सौन्दर्य एवं शोभायुक्त रूपसे करोड़ों कामदेवोंका गर्व हरनेवाले हैं ॥३॥ जय हो ! आप सुन्दर धनुष, तरकस, बाण, शक्ति, ढाल, तलवार और श्रेष्ठ कवचधारी, धर्मका भार वहन करनेमें धीर तथा रघुवंशमें सर्वश्रेष्ठ वीर हैं। आपकी भुजाओंमें अतुलित बल है जो कि लीलापूर्वक पृथिवीके भारी भारस्वरूप राक्षसोंको दलित करनेवाला है ॥४॥ श्रीरामजीकी जय हो ! आप मणि-जटित सुवर्णका मुकुट और मकराकृति कुण्डल धारण किये हैं। आपके सुन्दर ललाटपर तिलक झलक रहा है। आपके मुखकी शोभा चन्द्रमाके समान है। आप दिव्य आभूषण, पीताम्बर और यज्ञोपवीत धारण किये रहते हैं। आपके इस स्वरूपका ध्यान करके ऐसा कौन है जो कल्याणका भागी नहीं हुआ ॥५॥ जय हो ! आप भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नसे सेवित एवं सुमुख-सुमंत आदि मन्त्रियों और भक्तोंको सुखदायिनी सब वस्तुएँ देनेवाले, अधम, दुखी, दीन, पतित और महान् पापियोंके केवल एक बार 'रक्षा करो' कहकर प्रणाम करनेसे ही उद्धार करनेवाले हैं ॥६॥ जय हो ! जिनका यश चौदहो भुवनोंमें जगमगा रहा है, जो पुण्यमय और धन्य हैं, उन महाराज श्रीरामजीकी जय हो ! जिनकी कथा-रूपी गंगा आदिकवि महर्षि बाल्मीकि-रूपी पर्वतसे निकली है और जिसे पान करके तथा जिसमें स्नान करके सन्त-समाज हर्षित होता है, उन रामजीकी जय हो ॥७॥ हे रामजी ! आपकी जय हो ! आपके शासनकालमें चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और चारों आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ, संन्यास) अपने-अपने आचारपर चलनेवाले थे, समस्त स्त्री-पुरुष सत्य, शम, दम, दया और दानी स्वभाववाले, दुःखों और दोषोंसे रहित, सदा सन्तोषी और सुखी थे तथा आपके राज्यकी लीला सुना और गाया करते थे ॥८॥ हे वैराग्य और विज्ञानके समुद्र श्रीरामजी ! आपकी जय हो ! हे पाप-सन्तापहर्त्ता ! आप प्रणाम करते ही आनन्द देनेवाले हैं। अतः हे संशयको दूर करनेवाले जानकी- नाथ ! यह तुलसीदास आपकी शरणमें है, इसे अपने चरणोंका सहारा दीजिये ॥
८० विनय-पत्रिका विशेष १—'कलधौत मनि-मुकुट'—से सिद्ध होता है कि गोस्वामीजी राज्यसिंहा- सनासीन प्रभुमूर्तिका ही ध्यान करते थे; क्योंकि मुकुट उसी अवस्थाका द्योतक है। उनकी यह भावना अन्य स्थलोंपर भी प्रकट होती है। कविने और भी कई जगह रूपका वर्णन किया है, पर मुकुट-रहित। किन्तु ध्यानके लिए भक्तोंको यही रूप अधिक प्रिय है। २—'शम-दम-दया दान'—शम नाम है अन्तःकरण, मन, बुद्धि आदिके निग्रहका, दम नाम है बाह्येन्द्रियों (कान आँख आदि) के निग्रहका, दया नाम है मन-वचन-कर्मसे जीवमात्रको पीड़ा न पहुँचाने का और दान नाम है अन्न- वस्त्रादि देनेका। ३—'वारांनिधे—शब्दपर वियोगी हरिजीने यह टिप्पणी दी है:—'यह पद संस्कृत व्याकरणसे अशुद्ध है। 'वारिगाम् निधि' अथवा 'वारिनिधि' शुद्ध है....' (प्रथम संस्करण हरितोषिणी टीका); किन्तु वियोगी हरिजीके इस भ्रमको आचार्य पं० रामचन्द्रजी शुक्लने पुस्तकके परिचयमें दूर कर दिया है। 'वारांनिधि' शब्द व्याकरणसे अशुद्ध नहीं है। संस्कृतमें 'वारि' और 'वार' दोनों शब्द जल- वाचक हैं। इस 'वार' शब्दका सम्बन्धका रूप 'वारां' होगा, जिसमें अलुक् समासकी रीतिसे 'निधि' शब्द जोड़ा गया है। राग गौरी ( ४५ ) श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरन भव-भय दारुनं । नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद कंजारुनं ॥१॥ कंदर्प अगनित अमित छवि, नवनील नीरद सुंदरं । पट पीत मानहु तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक-सुतावरं ॥२॥ भजु दीनबंधु दिनेस दानव-दैत्य-वंस-निकंदनं । रघुनंद आनंदकंद कोसलचंद दसरथ-नंदनं ॥३॥