विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ७३ उनकी आदत ही भूल जानेकी है। जो प्राणी कहीं भी सम्मान नहीं पाता, उसे भी वह मान दिया करते हैं। जिस तुलसीदासको मन, वचन और कर्मसे स्वप्नमें भी दूसरेका सहारा नहीं है, उसे वह (अपने भुलक्कड़ स्वभावानुसार) भूल न जायँ ॥३॥ विशेष १—'अनहितौ'—इस शब्दमें कविने भगवान्के करुणानिधानत्वकी सार्थकता दिखलायी है। इसीसे उसने इसपर विशेष जोर देनेके लिए 'अरिकृत अनहितौ' यानी 'शत्रु द्वारा किये हुए अनिष्टोंको भी' लिखा है। 'भी' से सूचित हो रहा है कि और बातोंका भूल जाना तो साधारण बात है, पर शत्रु द्वारा किये हुए अनिष्टोंको भूल जाना कारुणिकताकी पराकाष्ठा है। श्रीराम-स्तुति ( ४३ ) जयति सच्चिद्व्यापकानन्द परब्रह्म-पद, विग्रह-व्यक्त लीलावतारी। विकल ब्रह्मादिसुर सिद्ध संकोचबस, विमल गुन-गेह नर-देह-धारी ॥१॥ जयति कोसलाधीस-कल्यान कोसलसुता, कुसल कैवल्य-फल चारुचारी वेद बोधित करम-धरम-धरनी-धेनु, विप्र सेवक साधु-मोदकारी ॥२॥ जयति ऋषि-मखपाल, समन सज्जन-साल, सापबस मुनि-वधू पापहारी। भंजि भव-चाप, दलि दाप भूपावली, सहित भृगुनाथ नतमाथ भारी॥३ जयति धारमिक-धुर, धीर रघुवीर गुरु-मातु-पितु-बंधु-वचनानुसारी। चित्रकूटाद्रि विन्ध्याद्रि दंडक विपिन, धन्यकृत पुन्यकानन बिहारी ४ जयति पाकारिसुत-काक करतूति-फलदानि खनि गर्त्त गोपित विराधा दिव्य देवी वेष देखि लखि निसिचरी जनु विडंबित करी विस्ववाधा५ जयति खर-त्रिसिर-दूषन चतुर्दस-सहस-सुभट-मारीच-संहारकर्त्ता। गृध्र-सवरी-भगति-विवस करुनासिंधु, चरित निरुपाधि, त्रिविधार्त्तिहर्त्ता जयति मद-अंध कुकबंध वधि, वालि बलसालि बधि, करन सुग्रीव राजा सुभट मर्कट भालु-कटक संघट सजत, नमत पद रावनानुज निवाजा॥७