भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 83

७२ विनय-पत्रिका जानकीजी! यदि आप इस दासकी वचन द्वारा इतनी सहायता कर देंगी, तो तुलसीदास आपके स्वामीकी गुण-गाथा गा-गाकर भव-सागरसे पार हो जायगा — तर जायगा ॥४॥ विशेष १—'किये वचन सहाइ'—में गोस्वामीजीका गूढ़ रहस्य भरा हुआ है। वास्तवमें महारानीजीके कहनेमात्रसे ही मनुष्यको परमात्माकी समीपता प्राप्त हो जाती है। क्योंकि वह किसीके सम्बन्धमें श्रीरामजीसे तभी कहेंगी, जब उनमें उसके प्रति दया उत्पन्न होगी, और उनमें दया उत्पन्न होनेपर श्रीरामजी- के हृदयमें दया उत्पन्न होना स्वाभाविक है। कारण यह कि श्रीसीता और रामका अभेदसम्बन्ध है। देखिये:— गिरा अरथ जल बीचि सम, कहियत भिन्न न भिन्न । बंदौं सीताराम पद, जिन्हहिं परम प्रिय खिन्न ॥ —रामचरितमानस । इस पदमें करुण-रसकी अपूर्व और अटूट धारा है। ( ४२ ) कवहूँ समय सुधि द्याइबो, मेरी मातु जानकी जन कहाइ नाम लेत हौं किये पन चातक ज्यों, प्यास प्रेम-पान को ॥१॥ सरल प्रकृति आपु जानिये करुना निधान की । जिन गुन, अरिकृत अनहितौ,दास-दोष सुरति चित रहत न दिये दानकी बानि बिसारनसील है मानद अमान की। तुलसीदास न बिसारिये, मन करम बचन जाके,सपनेहुँ गति न आनकी॥ शब्दार्थ — अरिकृत = शत्रु द्वारा किया हुआ। अनहितौ = अनिष्ट भी। सुरति = स्मरण। बिसारनसील = भूलनेकी। मानद = मान देनेवाले। अमान = निरादर । भावार्थ — हे मातेश्वरी जानकी, कभी समय पाकर भगवान्‌को मेरी सुध कराना। मैं चातककी भाँति प्रणपूर्वक उनका दास कहाकर उनका नाम जप रहा हूँ। मुझे उनका प्रेम-रस पीनेकी प्यास है ॥१॥ करुणा-निधान श्रीराम- जीके सरल स्वभावको आप जानती हैं। उन्हें अपना गुण, सेवकका अपराध दिये हुए दान तथा शत्रु द्वारा किये हुए अनिष्टोंका भी स्मरण नहीं रहता ॥२॥