भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 82, कुल 475 में से

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पृष्ठ 82

विनय-पत्रिका ७१ आज्ञा माँगी, आज्ञा पाते ही उन्होंने मथुरामें जाकर उसका वध करके प्रजाकी दुश्चिन्ता दूर कर दी। २—‘यत्प्रणामी' श्री वियोगीहरिने इसका अर्थ किया है ‘उस शत्रुघ्नजीको मैं प्रणाम करता हूँ।' किन्तु इसका शाब्दिक अर्थ है ‘जिसमें प्रणाम करनेकी क्षमता हो'। जैसे नाम और नामी हैं, वैसे ही प्रणाम और प्रणामी है। श्रीसीता-स्तुति राग-केदारा (४१) कबहुँक अंब, अवसर पाइ। मेरिऔ सुधि द्याइबी, कछु करुन-कथा चलाइ ॥ १ ॥ दीन, सब अँगहीन, छीन, मलीन, अघी अघाइ। नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ ॥ २ ॥ बूझिहैं ‘सो है कौन', कहिबी नाम दसा जनाइ। सुनत राम कृपालु के मेरी बिगरिऔ बनि जाइ ॥ ३ ॥ जानकी जगजननि जन की किये बचन सहाइँ। तरै तुलसीदास भव तव नाथ-गुन-गन गाइ ॥ ४ ॥ शब्दार्थ—अंब = माता। द्याइबी = दिलाना। अघी = पापी। अघाइ = परिपूर्ण। विगरिऔ = बिगड़ी हुई बात भी। जन = दास। तव = तुम्हारे। भावार्थ—हे माता, कभी अवसर मिलनेपर कुछ कारुणिक बात चलाकर प्रभुजीको मेरी भी याद दिलाना ॥१॥ कहना, एक दीन, सर्व साधनोंसे रहित, कृश, मलिन और पूरा पापी मनुष्य अपनेको आपकी दासी (तुलसी) का दास (तुलसीदास) कहलाकर आपका नाम लेकर यानी आपका भक्त बननेका ढोंग रचकर पेट भरता है ॥२॥ किन्तु यदि प्रभुजी पूछें कि वह कौन है, तब तुम मेरा नाम और (ऊपर कहे अनुसार) मेरी दशा उन्हें बताना। कृपालु प्रभुजीके इतना सुन लेनेसे ही मेरी बिगड़ी हुई बात भी बन जायगी ॥३॥ हे जगज्जननी

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