भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 81

७० विनय-पत्रिका जयति लवनाम्बुनिधि-कुंभ-संभव महादनुज-दुर्जन दवन, दुरितहारी । लक्ष्मणानुज, भरत-राम-सीता-चरन-रेनु-भूषित-भाल-तिलकधारी॥३॥ जयति श्रुतिकीर्त्ति-वल्लभ सुदुर्लभ सुलभ नमत नर्मद भुक्ति मुक्तिदाता दास तुलसी चरन-सरन सीदत विभो पाहि दीनार्त्त-संताप-हाता॥४॥ शब्दार्थ—करि = हाथी। किरन-केतू = किरणोंकी ध्वजा यानी सूर्य। महिदेव = ब्राह्मण। वर्म = कवच। चर्मासि = (चर्म+असि) ढाल और तलवार। लवनाम्बुनिधि = (लवण+ अम्बुनिधि) लवणासुररूपी समुद्र। कुंभ संभव = अगस्त्य। दुरित = पाप। श्रुतिकीर्त्ति = शत्रुघ्न- जीकी स्त्री। नर्मद = सुखदाता। सीदत = दुःख पा रहा है। भावार्थ—शत्रुरूपी हाथियोंका नाश करनेके लिए सिंहवत् शत्रुघ्नजीकी जय हो, जय हो ! आप शत्रुरूपी अन्धकार और पालेका हरण करनेके लिए साक्षात् सूर्य हैं। आप देवता, ब्राह्मण, पृथिवी, गऊ, भक्त, संत, सिद्ध और मुनियोंका कल्याण करनेवाले हैं। ॥१॥ आपका अंग-प्रत्यंग सुन्दर है; आप सुमित्राके पुत्र हैं और भरतजीकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं यह बात जगत् विख्यात है। जय हो ! आप कवच, ढाल, तलवार, धनुष, बाण और तरकस धारण करनेवाले तथा शत्रुओं द्वारा आये हुए संकटका नाश करके उनसे प्रणाम करानेवाले या उन्हें अपने पैरोंपर गिरानेवाले हैं ॥२॥ आप लवणासुररूपी समुद्रको पान कर जानेवाले अगस्त्यके समान हैं। आप बड़े-बड़े राक्षसों और दुष्टोंका संहार करनेवाले तथा पापोंका हरण करनेवाले हैं। आपकी जय हो ! आप लक्ष्मण- जीके छोटे भाई तथा भरत, राम और सीताकी चरण-रजका तिलक अपने सुन्दर मस्तकपर धारण करनेवाले हैं ॥३॥ हे श्रुतिकीर्ति-वल्लभ ! आपकी जय हो । आप ईश्वर-विमुखोंके लिए दुर्लभ और भक्तोंके लिए सुलभ हैं, प्रणाम करते ही सुख देनेवाले तथा भोगैश्वर्य और मुक्ति देनेवाले हैं। हे विभो ! तुलसीदास आपके चरणोंकी शरणमें आनेपर दुःख पा रहा है। हे दीनों और आर्त्तोंका दुःख दूर करनेवाले शत्रुघ्नजी मेरी रक्षा कीजिये ॥४॥ विशेष १—लवणासुर मथुराका राजा था। इसके अत्याचारोंसे गो-ब्राह्मण तथा संत-महात्मा तंग आ गये थे। शत्रुघ्नने उसका वध करनेके लिए रामचन्द्रजीसे

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