विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ६९ पूजन करते थे और जबतक रामजी वनवास समाप्त करके अयोध्यापुरीमें नहीं आये तबतक उस पादुकासे आज्ञा लेकर मन्त्रीकी भाँति राज्यकार्य करते रहे। २—'संजीवनी-समय-संकट'—हनुमान्जी मूर्च्छित लक्ष्मणजीके लिए संजीवनी बूटी लेकर आकाश मार्गसे लौट रहे थे। भरतजीने उन्हें देखकर यह अनुमान किया कि कोई मायावी राक्षस जा रहा है। इसलिए उन्होंने हनुमान्- जीपर एक बाण चला दिया। बाण लगते ही वह 'हा राम ! हा राम !' कहते हुए जमीनपर गिर पड़े। राम शब्द सुनते ही भरतजीको बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने सोचा कि यह तो राक्षस नहीं, कोई रामभक्त है। अतः तुरन्त ही उन्होंने दौड़कर हनुमान्जीको उठाकर हृदयसे लगा लिया। उसी समय हनुमान्जीने उनके बाणकी महिमा कही थी। ३—'गूढ़गति...जानी'—इस विषयमें जनकजीने महारानी सुनयनासे कहा है :— भरत महामहिमा सुनु रानी। जानहिं राम न सकहिं बखानी ॥ (रामचरितमानस) ४—'गन्धर्व गन गर्वहर'—एक बार गन्धर्वोंने भरतजीके ननिहाल केकय देशपर जिसे आजकल कश्मोर कहते हैं—आक्रमण किया था। भरतजीने जाकर उन्हें हराया और उन गन्धर्वोंको—जो कि रामचन्द्रजीके विमुख थे—रामगुण- गायक बना दिया। शत्रुघ्न-स्तुति राग धनाश्री ( ४० ) जयति जय सत्रु-करि-केसरी सत्रुहन, सत्रुतम-तुहिनहर किरनकेतू। देव-महिदेव-महि-धेनु-सेवक सुजन-सिद्ध-मुनि-सकल-कल्यान-हेतू ॥१॥ जयति सर्वांग सुन्दर सुमित्रा-सुवन, भुवन विख्यात-भरतानुगामी। वर्म चर्म्मासि-धनु-बान-तूनीर-धर सत्रु-संकट-समन यत्प्रनामी ॥२॥