भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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७४ विनय-पत्रिका जयति पाथोधि-कृत-सेतु कौतुक हेतु, काल-मन-अगम लइ ललकि लंका सकुल, सानुज, सदल दलित दसकंठ रन, लोक-लोकप किये रहित-संका जयति सौमित्रि-सीता-सचिव-सहित चले पुष्पकारूढ़ निज राजधानी। दास तुलसी मुदित अवधवासी सकल, राम भे भूप वैदेहि रानी ॥९॥ शब्दार्थ—व्यक्त = प्रकट। कोसलाधीस = दशरथ। कोसलसुता = कौशल्या। बोधित = विहित। मखपाल = यज्ञकी रक्षा करनेवाले। साल = पीड़ा देनेवाले, चुभनेवाले। पाकारिसुत = इन्द्रका पुत्र जयन्त। काक = कौआ। खानि = खोदकर। विराधा (विराध) = एक राक्षस। मर्कट = बन्दर। कटक = सेना। सजत = सुसज्जित करना। निवाजा = निहाल किया। ललकि = धुनमें आकर। सकुल = कुलके सहित। वैदेहि = जानकीजी। भावार्थ—सत्, चित्, व्यापक और आनन्दस्वरूप परब्रह्म उपाधिधारी श्री रामजीकी जय हो ! आपने लीला करनेके लिए ही व्यक्त अर्थात् साकार शरीरमें अवतार लिया है। आप व्याकुल ब्रह्मा आदि देवताओं तथा सिद्धोंके संकोचवश विशुद्ध गुणविशिष्ट मानव-शरीर धारण करनेवाले हैं ॥१॥ आपकी जय हो ! आप महाराज दशरथके कल्याणार्थ तथा महारानी कौशल्याकी कुशलके लिए मोक्षके सुन्दर चार फल हैं। (अर्थात् राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चारों भाई सारूप्य, सामीप्य, सायुज्य और सालोक्य मुक्तियोंके रूपमें उत्पन्न हुए हैं।) आप वेद-विहित धर्म-कर्म तथा पृथिवी, गो, ब्राह्मणके सेवकों और साधुओंको आनन्दित करनेवाले हैं ॥२॥ आपकी जय हो ! आप ब्रह्मर्षि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेवाले, साधु-महात्माओंके पीड़कोंका नाश करनेवाले तथा शापके कारण पत्थरके रूपमें पड़ी हुई गौतम-पत्नी अहिल्याको पापमुक्त करनेवाले हैं। आप शिवजीके धनुषको तोड़कर राजाओंके दर्पको चूर्ण करनेके साथ ही परशुरामके उन्नत मस्तकको नीचे झुकानेवाले हैं ॥३॥ आपकी जय हो ! आप गुरु, माता, पिता और भाईके वचन माननेवाले, धार्मिकताके धुरा, धीर और रघुकुलमें असाधारण वीर हैं। आपने चित्रकूटपर्वत और विन्ध्य पर्वतको धन्य कर दिया है और दंडक वनमें विहार करके उसे पुनीत बना दिया है ॥४॥ हे काकवेशी इन्द्रके पुत्र जयन्तको उसकी करनीका फल देनेवाले, गड्ढा खोदकर विराध राक्षसको गाड़नेवाले तथा दिव्य देवीके वेषमें सूपर्णखाको देखते ही पहचानकर मानो संसारके बाधास्वरूप रावणको अपमानित करनेवाले (सूपर्णखा-