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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

७४ विनय-पत्रिका जयति पाथोधि-कृत-सेतु कौतुक हेतु, काल-मन-अगम लइ ललकि लंका सकुल, सानुज, सदल दलित दसकंठ रन, लोक-लोकप किये रहित-संका जयति सौमित्रि-सीता-सचिव-सहित चले पुष्पकारूढ़ निज राजधानी। दास तुलसी मुदित अवधवासी सकल, राम भे भूप वैदेहि रानी ॥९॥ शब्दार्थ—व्यक्त = प्रकट। कोसलाधीस = दशरथ। कोसलसुता = कौशल्या। बोधित = विहित। मखपाल = यज्ञकी रक्षा करनेवाले। साल = पीड़ा देनेवाले, चुभनेवाले। पाकारिसुत = इन्द्रका पुत्र जयन्त। काक = कौआ। खानि = खोदकर। विराधा (विराध) = एक राक्षस। मर्कट = बन्दर। कटक = सेना। सजत = सुसज्जित करना। निवाजा = निहाल किया। ललकि = धुनमें आकर। सकुल = कुलके सहित। वैदेहि = जानकीजी। भावार्थ—सत्, चित्, व्यापक और आनन्दस्वरूप परब्रह्म उपाधिधारी श्री रामजीकी जय हो ! आपने लीला करनेके लिए ही व्यक्त अर्थात् साकार शरीरमें अवतार लिया है। आप व्याकुल ब्रह्मा आदि देवताओं तथा सिद्धोंके संकोचवश विशुद्ध गुणविशिष्ट मानव-शरीर धारण करनेवाले हैं ॥१॥ आपकी जय हो ! आप महाराज दशरथके कल्याणार्थ तथा महारानी कौशल्याकी कुशलके लिए मोक्षके सुन्दर चार फल हैं। (अर्थात् राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चारों भाई सारूप्य, सामीप्य, सायुज्य और सालोक्य मुक्तियोंके रूपमें उत्पन्न हुए हैं।) आप वेद-विहित धर्म-कर्म तथा पृथिवी, गो, ब्राह्मणके सेवकों और साधुओंको आनन्दित करनेवाले हैं ॥२॥ आपकी जय हो ! आप ब्रह्मर्षि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेवाले, साधु-महात्माओंके पीड़कोंका नाश करनेवाले तथा शापके कारण पत्थरके रूपमें पड़ी हुई गौतम-पत्नी अहिल्याको पापमुक्त करनेवाले हैं। आप शिवजीके धनुषको तोड़कर राजाओंके दर्पको चूर्ण करनेके साथ ही परशुरामके उन्नत मस्तकको नीचे झुकानेवाले हैं ॥३॥ आपकी जय हो ! आप गुरु, माता, पिता और भाईके वचन माननेवाले, धार्मिकताके धुरा, धीर और रघुकुलमें असाधारण वीर हैं। आपने चित्रकूटपर्वत और विन्ध्य पर्वतको धन्य कर दिया है और दंडक वनमें विहार करके उसे पुनीत बना दिया है ॥४॥ हे काकवेशी इन्द्रके पुत्र जयन्तको उसकी करनीका फल देनेवाले, गड्ढा खोदकर विराध राक्षसको गाड़नेवाले तथा दिव्य देवीके वेषमें सूपर्णखाको देखते ही पहचानकर मानो संसारके बाधास्वरूप रावणको अपमानित करनेवाले (सूपर्णखा-

विनय-पत्रिका ७५ की नाक और कान काटनेवाले) श्रीरामचन्द्रजी ! आपकी जय हो ! ॥५॥ आप खर, त्रिशिरा, दूषण, उनकी चौदह हजार सेना तथा मारीचके संहारकर्त्ता हैं। आप गृद्ध और शबरीकी भक्तिके वशमें हो जानेवाले, करुणाके समुद्र, निष्कलंक चरित्रवाले तथा तीन प्रकारके (दैहिक, दैविक, भौतिक) दुःखोंको हरनेवाले हैं ॥६॥ आपकी जय हो ! आपने मदान्ध और दुष्ट कबन्धको मारा तथा महाबलवान् बालिका वध करके सुग्रीवको राजा बनाया। आपने अच्छे-अच्छे योद्धा बन्दरों और रीछोंकी सेना संघटित करके सजायी और पैरोंपर गिरते ही विभीषणको निहाल कर दिया ॥७॥ जय हो ! आपने लीलाके ही लिए समुद्रपर पुलका निर्माण किया, जो लंकापुरी कालके मनके लिए भी अगम थी, उसे आप धुनमें आकर ले बीते और कुल-सहित, भाई-सहित और दल-बल-सहित रावणको रणभूमिमें कुचलकर तीनों लोकों एवं इन्द्र-कुबेरादि लोकपालोंको निःशंक कर दिया ॥८॥ श्रीरामजीकी जय हो ! (उसके बाद) आप लक्ष्मण, सीता और सुग्रीव हनुमान् आदि मंत्रियों-सहित पुष्पक विमानपर बैठकर अपनी राजधानी अयोध्या- को चले। तुलसीदास कहते हैं कि रामचन्द्रजीके राजा होनेपर तथा सीताजीके रानी होनेपर समस्त अयोध्यानिवासी आह्लादित हो गये ॥९॥ विशेष १—गुसाईंजीने इस पदमें रामावतारके चरित्रका आद्योपान्त स्मरण किया है। यहाँ रामावतारकी एक भी मुख्य घटना छूटने नहीं पायी है। २—'ऋषि-मखपाल'—विश्वामित्रके आश्रमके पास राक्षसोंने इतना उत्पात मचा रखा था कि वह बेचारे निर्विघ्न तपस्या ही नहीं करने पाते थे। अतः वह यज्ञकी रक्षाके लिए राम-लक्ष्मणको अयोध्यासे अपने आश्रममें ले गये। रामजी- ने लक्ष्मणको साथ लेकर मुनिके यज्ञकी रक्षा की और बहुत-से उत्पाती राक्षसों- को मार डाला। ३—'मुनिवधू पापहारी'—परम सुन्दरी अहिल्या गौतम ऋषिकी स्त्री थी। एक दिन सन्ध्याके समय जब कि गौतम ऋषि सन्ध्यावन्दनके निमित्त बाहर गये थे, देवराज इन्द्र गौतमका रूप धारण करके अहिल्याके पास पहुँचा। वह उसके सौन्दर्यपर मुग्ध था। उसके रतिदान माँगनेपर पहले तो अहिल्याने

७६ विनय-पत्रिका कुसमय समझकर अस्वीकार कर दिया, पर पातिव्रत धर्म समझकर पीछे उसे उसके प्रस्तावसे सहमत होना पड़ा। सम्भोगके बाद ही गौतम ऋषि आ गये। उन्होंने योगबलसे सब रहस्य जान लिया और क्रुद्ध होकर इन्द्रको शाप दिया कि तेरे एक सहस्र भग हो जायँ, तथा अहिल्याको शाप दिया कि तू पत्थर हो जा। पश्चात् जब उनका क्रोध शान्त हुआ तो उन्होंने दोनोंके शापका प्रतिकार बतलाया। कहा, जब श्रीरामजी शिव-धनुषको तोड़ेंगे, तब इन्द्रके सहस्र भग सहस्र-नेत्रोंके रूपमें परिणत हो जायँगे और श्रीरामजीके चरणस्पर्शसे अहिल्या- का उद्धार हो जायगा। ४—'भृगुनाथ नतमाथ'—रामजीके धनुष तोड़नेपर परशुरामने आकर बहुत क्रोध किया था। उन्हें अपने बल-वीर्यका बड़ा घमण्ड था। उन्होंने इक्कीस बार क्षत्रिय राजाओंको जीतकर समूची पृथिवीका दान कर दिया था। किन्तु रामजीके सामने अन्तमें उन्हें भी सिर झुकाना पड़ा था। ५—'पाकारिसुत'—इन्द्रका पुत्र जयन्त कौएका वेष धारण करके श्रीरामजीका बल देखने आया और सीताके चरणोंमें चोंच मारकर भागा। श्रीरामजीने सींकका धनुष-बाण बनाकर उसे मारा। उसने नकली वेष धारण किया था, इसलिए श्रीरामजीने उसपर नकली बाण चलाकर ही अपने बाणके प्रभुत्वका दिग्दर्शन कराना उचित समझा। अभागा जयन्त व्याकुल होकर भागने लगा, पर जब पीछे फिरकर देखता तो बाण उसके पीछे लगा रहता। ब्रह्मलोक, शिवलोक, इन्द्रपुर तथा और तमाम लोकोंमें घूम आया, किन्तु कहीं उसे शरण न मिली। अन्तमें उसे श्रीरामजीकी शरण लेनी पड़ी। भगवान्‌को दया आ गयी, अतः उन्होंने उसके प्राण नहीं लिये, केवल एकाक्ष करके छोड़ दिया। कहते हैं तभीसे कौओंके एक ही पुतली होती है। ६—विराध और कबन्ध ये दोनों राक्षस थे। भगवान्‌ने इनका वध किया था। ७—'दिव्य देवी वेष देखि लखि निसिचरी'—में 'देखि' 'लखि' ये दोनों शब्द एक ही अर्थके बोधक होनेके कारण पुनरुक्तिसे दूषित दिखाई पड़ते हैं; किन्तु यहाँ पुनरुक्ति-दोष नहीं है। देखना, बाह्य चक्षुका विषय है और 'लखने' में मनश्चक्षुके विषयकी झलक है। श्रीरामजीने सूपर्णखाको देवी रूपमें देखा,

विनय-पत्रिका ७७ इसके लिए तो कविने देखि लिखा और यह देवी नहीं सूपर्णखा राक्षसी है, यह जान लिया, इसके लिए उन्होंने 'लखि' शब्दका प्रयोग किया । ८—'करुना'—भक्तवर बैजनाथजीने 'करुणा'के सम्बन्धमें लिखा है:— सेवक दुखतें दुखित है, स्वामि विकल है जाइ। दुःख निवारे सीघ्र ही, 'करुना' गुन सों आइ ॥ ( ४४ ) जयति राज-राजेन्द्र राजीवलोचन, राम, नाम कलि-कामतरु, साम साली। अनय-अंभोधि-कुंभज, निसाचर-निकर- तिमिर घनघोर खर किरनमाली ॥१॥ जयति मुनिदेव नरदेव दशरथके, देव-मुनिवंद्य किय अवध-वासी। लोकनायक-कोक-सोक-संकट-समन, भानुकुल-कमल-कानन - विकासी ॥२॥ जयति सिंगार-सर तामरस-दामदुति- देह, गुनगेह, विस्वोपकारी। सकल सौभाग्य-सौंदर्य सुषमारूप, मनोभव कोटि गर्वापहारी ॥३॥ जयति सुभग सारंग सुनिषंग सायक सक्ति, चारु चर्मासि वर वर्मधारी। धर्मधुरधीर, रघुवीर, भुज-बल अतुल, हेलया दलित भूभार भारी ॥४॥ जयति कलधौत मनि-मुकुट, कुंडल, तिलक, झलक भलिभाल, विधु-वदन-सोभा। दिव्य भूषन, वसन पीत, उपवीत, किय ध्यान कल्यान-भाजन न को भा ॥५॥

७८ विनय-पत्रिका जयति भरत-सौमित्रि-सत्रुघ्न-सेवित, सुमुख, सचिव-सेवक-सुखद, सर्वदाता। अधम, आरत, दीन, पतित, पातक-पीन सकृत नतमात्र कहि 'पाहि' पाता ॥६॥ जयति जय भुवन दसचारि जस जगमगत, पुन्यमय, धन्य जय राम राजा। चरित-सुरसरित कवि-मुख्य गिरि निःसरित, पिवत, मज्जत मुदित सँत-समाजा ॥७॥ जयति वर्णाश्रमाचारपर नारि-नर, सत्य - सम-दम-दया-दानसीला। विगत दुख - दोष, संतोष सुख सर्वदा, सुनत, गावत राम राजलीला ॥८॥ जयति वैराग्य-विज्ञान-वारांनिधे, नमत नर्मद, पाप-ताप-हर्त्ता। दास तुलसी चरन सरन संसय-हरन, देहि अवलंब वैदेहि-भर्त्ता ॥९॥ शब्दार्थ—राजीवलोचन = कमलनेत्र । अनय = अनीति । निकर = समूह । खर = तीक्ष्ण । कोक = चकवा । तामरस = कमल । दाम = माला । मनोभव = कामदेव । सारंग = धनुष । सुनिषंग = सुन्दर तरकस । हेलया = लीलापूर्वक । कलधौत = सुवर्ण । को = कौन । भा = हुआ । पीन = मोटा, पुष्ट । पाता = उद्धार करनेवाले । कविमुख्य = मुख्य कवि यानी आदिकवि महर्षि बाल्मीकि । दानसीला = दानी स्वभाववाले । वारांनिधे = समुद्र । नर्मद = आनन्ददाता । भावार्थ—हे श्रीरामजी ! आपकी जय हो ! आप राजराजेश्वरोंमें इन्द्र हैं, आप कमलनेत्र हैं, आपका नाम 'राम' कलियुगके लिए कल्पवृक्ष है, आप साम्य भाव रखनेवाले, अनीतिरूपी समुद्रको सोख जानेके लिए अगस्त्य हैं और दानव- दल-रूपी सघनान्धकारका नाश करनेके लिए मध्याह्नकालीन सूर्य हैं ॥१॥ हे मुनि, देवता और मनुष्योंके स्वामी दशरथ-लला ! आपकी जय हो ! आपने अपनी विभूतिसे अवधवासियोंको ऐसा बना दिया कि देवता और मुनि भी

विनय-पत्रिका ७९ उनकी वन्दना करने लगे। आप लोकपाल-रूपी चक्रवाकोंके शोक-सन्तापका नाश करनेवाले तथा सूर्यवंश-रूपी कमल-वनको विकसित करनेवाले हैं ॥२॥ जय हो ! आपके शरीरकी शोभा शृंगार-रूपी सरोवरमें उत्पन्न हुए नीले कमलों- की आभाके समान है। आप गुणोंके धाम हैं और संसारका उपकार करनेवाले तथा सब प्रकारके सौभाग्य, सौन्दर्य एवं शोभायुक्त रूपसे करोड़ों कामदेवोंका गर्व हरनेवाले हैं ॥३॥ जय हो ! आप सुन्दर धनुष, तरकस, बाण, शक्ति, ढाल, तलवार और श्रेष्ठ कवचधारी, धर्मका भार वहन करनेमें धीर तथा रघुवंशमें सर्वश्रेष्ठ वीर हैं। आपकी भुजाओंमें अतुलित बल है जो कि लीलापूर्वक पृथिवीके भारी भारस्वरूप राक्षसोंको दलित करनेवाला है ॥४॥ श्रीरामजीकी जय हो ! आप मणि-जटित सुवर्णका मुकुट और मकराकृति कुण्डल धारण किये हैं। आपके सुन्दर ललाटपर तिलक झलक रहा है। आपके मुखकी शोभा चन्द्रमाके समान है। आप दिव्य आभूषण, पीताम्बर और यज्ञोपवीत धारण किये रहते हैं। आपके इस स्वरूपका ध्यान करके ऐसा कौन है जो कल्याणका भागी नहीं हुआ ॥५॥ जय हो ! आप भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नसे सेवित एवं सुमुख-सुमंत आदि मन्त्रियों और भक्तोंको सुखदायिनी सब वस्तुएँ देनेवाले, अधम, दुखी, दीन, पतित और महान् पापियोंके केवल एक बार 'रक्षा करो' कहकर प्रणाम करनेसे ही उद्धार करनेवाले हैं ॥६॥ जय हो ! जिनका यश चौदहो भुवनोंमें जगमगा रहा है, जो पुण्यमय और धन्य हैं, उन महाराज श्रीरामजीकी जय हो ! जिनकी कथा-रूपी गंगा आदिकवि महर्षि बाल्मीकि-रूपी पर्वतसे निकली है और जिसे पान करके तथा जिसमें स्नान करके सन्त-समाज हर्षित होता है, उन रामजीकी जय हो ॥७॥ हे रामजी ! आपकी जय हो ! आपके शासनकालमें चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और चारों आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ, संन्यास) अपने-अपने आचारपर चलनेवाले थे, समस्त स्त्री-पुरुष सत्य, शम, दम, दया और दानी स्वभाववाले, दुःखों और दोषोंसे रहित, सदा सन्तोषी और सुखी थे तथा आपके राज्यकी लीला सुना और गाया करते थे ॥८॥ हे वैराग्य और विज्ञानके समुद्र श्रीरामजी ! आपकी जय हो ! हे पाप-सन्तापहर्त्ता ! आप प्रणाम करते ही आनन्द देनेवाले हैं। अतः हे संशयको दूर करनेवाले जानकी- नाथ ! यह तुलसीदास आपकी शरणमें है, इसे अपने चरणोंका सहारा दीजिये ॥

८० विनय-पत्रिका विशेष १—'कलधौत मनि-मुकुट'—से सिद्ध होता है कि गोस्वामीजी राज्यसिंहा- सनासीन प्रभुमूर्तिका ही ध्यान करते थे; क्योंकि मुकुट उसी अवस्थाका द्योतक है। उनकी यह भावना अन्य स्थलोंपर भी प्रकट होती है। कविने और भी कई जगह रूपका वर्णन किया है, पर मुकुट-रहित। किन्तु ध्यानके लिए भक्तोंको यही रूप अधिक प्रिय है। २—'शम-दम-दया दान'—शम नाम है अन्तःकरण, मन, बुद्धि आदिके निग्रहका, दम नाम है बाह्येन्द्रियों (कान आँख आदि) के निग्रहका, दया नाम है मन-वचन-कर्मसे जीवमात्रको पीड़ा न पहुँचाने का और दान नाम है अन्न- वस्त्रादि देनेका। ३—'वारांनिधे—शब्दपर वियोगी हरिजीने यह टिप्पणी दी है:—'यह पद संस्कृत व्याकरणसे अशुद्ध है। 'वारिगाम् निधि' अथवा 'वारिनिधि' शुद्ध है....' (प्रथम संस्करण हरितोषिणी टीका); किन्तु वियोगी हरिजीके इस भ्रमको आचार्य पं० रामचन्द्रजी शुक्लने पुस्तकके परिचयमें दूर कर दिया है। 'वारांनिधि' शब्द व्याकरणसे अशुद्ध नहीं है। संस्कृतमें 'वारि' और 'वार' दोनों शब्द जल- वाचक हैं। इस 'वार' शब्दका सम्बन्धका रूप 'वारां' होगा, जिसमें अलुक् समासकी रीतिसे 'निधि' शब्द जोड़ा गया है। राग गौरी ( ४५ ) श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरन भव-भय दारुनं । नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद कंजारुनं ॥१॥ कंदर्प अगनित अमित छवि, नवनील नीरद सुंदरं । पट पीत मानहु तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक-सुतावरं ॥२॥ भजु दीनबंधु दिनेस दानव-दैत्य-वंस-निकंदनं । रघुनंद आनंदकंद कोसलचंद दसरथ-नंदनं ॥३॥

विनय-पत्रिका ८१ सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषनं । आजानुभुज सर-चाप-धर, संग्राम-जित-खर दूषनं ॥४॥ इति वदति तुलसीदास संकर-सेष मुनि-मन रंजनं । मम-हृदय-कंज-निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ॥५॥ शब्दार्थ—कंजारुन = (कंज+अरुन) लाल कमल। कन्दर्प = कामदेव। नीरद = बादल। उदारु = सुन्दर। आजानुभुज = घुटनोंतक लम्बी भुजावाले। रंजन = प्रसन्न करने- वाले। गंजन = नाशकर्ता। भावार्थ—रे मन ! संसारके भयंकर भयको हरनेवाले कृपालु श्रीरामचन्द्रको भज। उनके नेत्र नव-विकसित कमलके समान हैं; मुख कमल-सदृश है; हाथ और चरण भी लाल कमलके सदृश हैं ॥१॥ उनकी छवि अगणित कामदेवोंसे बढ़- कर है और शरीर नवीन नीले मेघ जैसा सुन्दर है। मेघ-रूपी शरीरपर पीताम्बर मानो बिजलीकी तरह चमक रहा है, ऐसे पवित्ररूप जानकीनाथ श्रीरघुनाथजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥२॥ रे मन ! दीनोंके बन्धु, सूर्यके समान तेजस्वी, दैत्य- दानव-वंशका मूलोच्छेद करनेवाले, आनन्दकन्द कोशलदेश-रूपी आकाशमें चन्द्रमाके समान दशरथ-नन्दन श्रीरामजीका भजन कर। वह सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल, मस्तकपर सुन्दर तिलक और मनोहर अंग-प्रत्यंगमें आभूषण धारण करनेवाले, आजानुबाहु, धनुष-बाणधारी तथा संग्राममें खर-दूषणको जीतने- वाले हैं ॥४॥ तुलसीदास इतना ही कहता है कि शंकर, शेष और मुनियोंके मनको प्रसन्न करनेवाले तथा काम-क्रोधादि दुष्टोंका नाश करनेवाले हे रघुनाथ- जी ! आप मेरे हृदयकमलमें निवास कीजिये ॥५॥ विशेष १—‘मम हृदय-कंज...गंजन’—कहनेका आशय यह है कि आप कामादि खल-दल-गंजन हैं, अतः मेरे हृदयसे इन दोषोंको निकाल दीजिये । इनका नाश होते ही मेरा हृदय विकसित हो जायगा। इसीसे कविने हृदय-कंजका प्रयोग किया है। ६

८२ विनय-पत्रिका राग रामकली ( ४६ ) सदा राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, मूढ़ मन, वार वारं। सकल सौभाग्य-सुख-खानि जिय जानि सठ, मानि विस्वास वद वेदसारं ॥ १ ॥ कोसलेन्द्र नव-नीलकंजाभतनु, मदन-रिपु-कंज हृदि-चंचरीकं । जानकीरवन सुखभवन भुवनैकप्रभु, समर-भंजन, परम कारुनीकं ॥ २ ॥ दनुज-वन-धूमधुज पीन आजानुभुज, दंड-कोदंड वर चंड वानं । अरुन कर चरन मुख नयन राजीव, गुन-अयन, वहु-मयन-सोभा-निधानं ॥ ३ ॥ वासनावृंद-कैरव-दिवाकर, काम- क्रोध-मद-कंज कानन-तुषारं । लोभ अति मत्त नागेन्द्र पंचाननं भक्तहित हरन संसार-भारं ॥ ४ ॥ केसवं, क्लेसहं, केस-वन्दित पद- द्वंद मन्दाकिनी-मूलभूतं । सर्वदानंद-संदोह, मोहापहं घोर-संसार-पाथोधि-पोतं ॥ ५ ॥ सोक-सन्देह-पाथोदपटलानिलं, पाप-पर्वत-कठिन-कुलिसरूपं । संतजन-कामधुक-धेनु, विश्रामपद, नाम कलि-कलुष-भंजन-अनूपं ॥ ६ ॥

विनय-पत्रिका ८३ धर्म-कल्पद्रुमाराम, हरिधाम-पथि- संवलं, मूलमिदमेव एकं । भक्ति-वैराग्य-विग्यान-सम-दान-दम, नाम आधीन साधन अनेकं ॥ ७ ॥ तेन तप्तं, हुतं, दत्तमेवाखिलं, तेन सर्वे कृतं कर्मजालं । येन श्रीरामनामामृतं पानकृत- मनिसमनवद्यमवलोक्य कालं ॥ ८ ॥ सुपच, खल, भिल्ल, जमनादि हरिलोकगत, नाम बल बिपुल मति मलिन परसी । त्यागि सब आस, संत्रास, भवपास असि निसित हरिनाम जपु दास तुलसी ॥ ९ ॥ शब्दार्थ—वद=कह । नव-नीलकंजाम=नवीन नीले कमलके समान आभा । हृदि=हृदयमें । चंचरीक=भ्रमर । चंड=प्रचंड । कैरव=कुमुदिनी । नागेन्द्र=गजेंद्र । पंचाननं=सिंह । क्लेसहं=क्लेशहन्ता । केस=क+ईश) ब्रह्मा और शिव । संदोह= समूह । पोतं=जहाज । पाथोदपटलानिलं=मेघसमूहके लिए पवनरूप । कल्पद्रुम+ आराम=कल्पवृक्षका बगीचा । संबल=कलेवा, राहखर्च । मूलमिदमेव=(मूलम्+इदम्+ एव) यही मूल है। पानकृतम्+अनिशं (बारम्बार)+अनवद्यम् (अखंड)+अवलोक्य (देखने योग्य) । निसित=तीक्ष्ण, पैनी । भावार्थ—रे मूढ़ मन ! हमेशा और बारम्बार राम-नामका जप कर । रे शठ ! यह जप सब सौभाग्य और सुखोंकी खानि है, ऐसा जीमें जानकर तथा यही 'वेदोंका सार' है, इसपर विश्वास मानकर राम राम कहा कर ॥१॥ कोश- लेन्द्र श्रीरामजीके शरीरकी आभा नवीन नीले कमलके समान है। वह शिवजीके हृदयमें विचरण करनेवाले भ्रमर हैं । वह सीता-वल्लभ, आनन्द-निधान, विश्व- ब्रह्मांडके एकमात्र स्वामी, युद्धमें खलोंके नाशकर्ता तथा अत्यन्त कारुणिक हैं ॥२॥ वह दैत्य-समूहरूपी वनके लिए अग्निके समान हैं और पुष्ट आजानु-भुज-दंडोंमें सुन्दर धनुष एवं तीखे बाण धारण किये हुए हैं । उनके हाथ, पैर, मुख और नेत्र लाल कमलके सदृश हैं; वह सर्वगुण-निधान तथा अनेक कामदेवोंकी शोभाके

८४ विनय-पत्रिका धर हैं ॥३॥ वह वासना-समूहरूपी कुमुदिनीको मुरझानेके लिए सूर्य हैं और काम-क्रोध-मदादिरूपी कमलवनके लिए पाला हैं। वह अत्यन्त मदोन्मत्त लोभरूपी गजेंद्रके लिए सिंह तथा भक्तोंके हितार्थ संसारका भार उतारनेवाले हैं ॥४॥ उनका नाम केशव है, वह क्लेशोंका नाश करनेवाले हैं, उनके चरण ब्रह्मा और शिवसे वंदित तथा गंगाजीके उद्गमस्थान हैं। वह सर्वदा आनन्द-समूह, मोह- विनाशक और घोर संसार-समुद्रको पार करनेके लिए जहाज-स्वरूप हैं ॥५॥ वह शोक और संदेहरूपी मेघ-समूहको तितर-बितर करनेके लिए वायुरूप तथा पाप- रूपी कठिन पर्वतको तोड़नेके लिए वज्ररूप हैं। उनका नाम संतोंके लिए काम- धेनुके समान मनवांछित फल देनेवाला, विश्रामप्रद और कलिकालके पापोंका नाश करनेमें अनुपम है ॥६॥ रामका नाम धर्मरूपी कल्पवृक्षका बगीचा है और प्रभुधाममें जानेवाले पथिकोंके लिए राह-खर्चके समान यही एक मूल आधार है। भक्ति, वैराग्य, विज्ञान, शम, दम, दान प्रभृति मुक्तिके अनेक साधन सब इस नामके ही अधीन हैं ॥७॥ अखंड कलिकालको देखकर जिसने बारम्बार श्रीराम- नामरूपी अमृतका पान किया, उसने तप कर लिया, यज्ञ कर लिया, सर्वस्व दान दे दिया और सब उत्तम कर्म कर डाला ॥८॥ बड़े-बड़े मलिन बुद्धिवाले चांडाल, खल, भील, यवन आदि नामके ही बलसे विष्णुलोकमें चले गये। अतः सारी आशाओं और भयको छोड़कर हे तुलसीदास, तू संसार-बंधनको काटनेके लिए तेज धारकी तलवारके समान भगवान्‌के नामका जप कर ॥९॥ विशेष १—'कोसलेंद्र' वियोगी हरिजीने इस चरणमें, छन्दोभङ्ग बतलाते हुए टिप्पणीमें 'जयति कुसलेन्द्र' कर देनेकी सम्मति प्रकट की है। हम भी उनकी इस सम्मतिका समर्थन करते हैं; किन्तु यथार्थतः विनय-पत्रिकाके समस्त पद गीत-काव्य हैं, अतः इनमें छन्दोभंग देखनेकी आवश्यकता नहीं। २—'वासना-वृन्द'—सारे कष्टोंकी जड़ है। २—'काम-धुक-धेनु' कलियुगमें राम-नामके प्रतापसे सब-कुछ प्राप्त हो सकता है। गोस्वामीजीने रामचरितमानसमें लिखा है:—

ब्रह्म राम तें नाम बड़, वर-दायक वर-दानि । रामचरित सत कोटि महँ, लिय महेस जिय जानि ॥ ✕ ✕ ✕ ✕ नाम कामतरु काल कराला । सुमिरत समन सकल जगजाला ॥ राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितुमाता ॥ नहिं कलि करम न भगति विवेकू । राम-नाम अवलम्बन एकू ॥ अथवा कलियुग केवल नाम अधारा । जानि लेहि जो जाननि हारा । ४—'कर्मजालं'—यों तो कर्मके कई भेद हैं और उनका उल्लेख भी पीछे किया जा चुक है, किन्तु यहाँ कर्मसे अभिप्राय है वेद-विहित कर्म । ५—'जमन'—यवन । एक मुसलमानके मुखसे मरते समय 'हराम' शब्द निकला था । उसमें 'राम' शब्द आ जानेके कारण उसकी मुक्ति हो गयी ।

( ४७ ) ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन । हरन दुखदुंद गोचिन्द आनंदघन ॥१॥ अचरचर रूप हरि, सर्वगत, सर्वदा वसत, इति वासना धूप-दीजै । दीप निजबोध गत-कोह-मद मोह-तम, प्रौढ अभिमान चितवृत्ति छीजै ॥२॥ भाव अतिसय विसद प्रवर नैवैद्य सुभ श्रीरमन परम संतोषकारी । प्रेम तांबूल गत सूल संसय सकल, विपुल भव-वासना-बीजहारी ॥३॥ असुभ-सुभकर्म-घृतपूर्न दस बर्तिका, त्याग-पावक, सतोगुनप्रकासं । भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली, अर्पि नीराजनं जग-निवासं ॥४॥

८६ विनय-पत्रिका विमल हृदि-भवन कृत सांति परजंक सुभ, सयन विश्राम श्रीराम राया। छमा-करुना प्रमुख तत्र परिचारिका, यत्र हरि तत्र नहिं भेद, माया ॥५॥ एहि आरती-निरत सनकादि, श्रुति, सेष, सिव, देवऋषि, अखिल मुनि तत्व-दरसी। करै सोइ तरै, परिहरै कामादि मल, वदति इति अमल-मति दास तुलसी ॥६॥ शब्दार्थ—गोविंद = इन्द्रियोंके स्वामी । वासना = इच्छा, सुगन्ध । छीजै = नष्ट कर दे । प्रवर = श्रेष्ठ । ताम्बूल = पान । वर्तिका = बत्ती । नीराजनं = आरती । परजंक = पलँग । प्रमुख = प्रधान । निरत = तत्पर । भावार्थ—हे मन ! रघुकुलमें वीर श्रीरामजीकी आरती इस प्रकार कर । वह दुःख-द्वन्द्वों (रागद्वेषादि) के नाशक, इन्द्रियोंके स्वामी और आनन्दघन हैं ॥१॥ जड़-चेतन सब रूप परमात्माका है, वह सर्वगत और एकरस हैं—इस वासना (सुगन्ध) की धूप दे। धूपके बाद दीप चाहिये। सो आत्मज्ञानरूपी दीपकसे क्रोध-मद-मोहरूपी अन्धकारको दूर करके अभिमानभरी चित्तकी वृत्ति- योंको नष्ट कर दे ॥२॥ पश्चात् तू मङ्गलमूर्ति लक्ष्मीपति भगवान्‌को परम सन्तोष- कारी अपने अत्यन्त निर्मल और श्रेष्ठ भावका नैवेद्य चढ़ा। फिर, दुःख और संशयोंसे रहित होकर अपार संसारके वासनारूपी बीजको नाश करनेवाले 'प्रेम'- का ताम्बूल अर्पण कर ॥३॥ उसके बाद शुभ और अशुभ-कर्मरूपी घीसे तर की हुई दस इन्द्रियरूपी बत्तियोंको त्यागरूपी आगसे जलाकर सतोगुण-रूपी प्रकाश कर । इस प्रकार भक्ति, वैराग्य और विज्ञानरूपी दीपावलीकी आरती अर्पित करके संसारमें निवास कर ॥४॥ आरती करनेके बाद अपने निर्मल हृदयरूपी गृहमें शान्तिरूपी कल्याणकारी पलँगके ऊपर महाराज रामचन्द्रजीको सुलाकर विश्राम करा। वहाँ क्षमा और करुणा सरीखो प्रमुख सेविकाओंको नियुक्त कर दे। जहाँ प्रभुजी रहते हैं, वहाँ न तो भेद-बुद्धि रहती है और न माया ही ॥५॥ सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार, वेद, शेष, शिव, नारद और समस्त तत्त्वदर्शी मुनि इस आरतीमें तत्पर रहते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि जो कोई ऐसी आरती

विनय-पत्रिका ८७ करता है वही तर जाता है और कामादि पापोंसे मुक्त हो जाता है—ऐसा निर्मल बुद्धिवाले तत्त्ववेत्ताओंका कथन है॥६॥ विशेष १—इस पदमें रूपक अलंकार है । २—इस पदमें आरतीके छ अंग (धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, आरती और शयन) दिखलाये गये हैं । ३—'धूप'—धूपके ५, ६, ८, १२, १६ अंग हैं । प्रत्येकपर भिन्न-भिन्न अर्थ निकलता है । उदाहरणार्थ, पाँच अंगकी धूप लेनेपर यहाँ नियम (१ शौच, २ सन्तोष, ३ तप, ४ स्वाध्याय, ५ ईश्वर प्रणिधान) की धूपका बोध होगा । ४—'चितवृत्ति'—चित्तकी वृत्तियोंके निरोध अथवा समूल नाश कर डालनेका ही नाम योग है—'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' । ५—'दस वर्त्तिका'—महाकवि तुलसीदासजीने दस इन्द्रियोंको ही दस बत्ती कहा है । उन दस इन्द्रियोंमें श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा वाक् , पाणि, पाद, उपस्थ और गुद ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । ( ४८ ) हरति सब आरती आरती राम की । दहन दुख-दोष, निर्मूलिनी काम की ॥१॥ सुभग सौरभ धूप दीपवर मालिका । उड़त अघ-बिहँग सुनि ताल करतालिका ॥२॥ भक्त-हृदि-भवन, अज्ञान-तम-हारिनी । विमल विज्ञानमय तेज-विस्तारिनी ॥३॥ मोह-मद-कोह-कलि-कंजहिमजामिनी । मुक्ति की दूतिका, देह-दुति दामिनी ॥४॥ प्रनत-जन-कुमुद-वन-इन्दु-कर-जालिका । तुलसि अभिमान-महिषेसु बहु कालिका ॥५॥ शब्दार्थ—आरती = क्लेश । सुभग = सुन्दर । सौरभ = सुगन्ध । विस्तारिनी = फैलाने- वाली । जामिनी = रात । दूतिका = दूती । प्रनत = शरणमें आये हुए। महिषेस = महिषासुर ।

८८ विनय-पत्रिका भावार्थ—श्रीरामजीकी आरती सब क्लेशोंको हर लेती है। वह दुःख- दोषोंको जला डालती तथा कामनाओं या इच्छाओंको निर्मूल कर डालती है ॥१॥ वह सुन्दर सुगन्धयुक्त धूप श्रेष्ठ दीपकोंकी माला है। उस आरतीके समय हाथोंकी तालीका शब्द सुनकर पापरूपी पक्षी उड़ जाते हैं ॥२॥ वह भक्तोंके हृदय-मन्दिरसे अज्ञानान्धकारको दूर करनेवालो तथा (हृदयमें) निर्मल विज्ञान- मय प्रकाशको फैलानेवाली है ॥३॥ वह मोह, मद, क्रोध, कलिरूपी कमलोंको मुरझानेके लिए बर्फीली रात है, मुक्ति-रूपी नायिकासे मिलानेके लिए बिजलीके समान चमकदार शरीरवाली दूती है ॥४॥ वह शरणागत भक्त-रूपी कुमुदिनीके वनको विकसित करनेके लिए चन्द्रमाकी किरण-माला है। तुलसीदास कहते हैं कि वह अभिमानरूपी महिषासुरके लिए अगणित कालिका देवीके समान है ॥५॥ विशेष १—‘आरती आरती' में यमकालंकार है। जब एक ही शब्द भिन्न-भिन्न अर्थमें कई बार आता है, तो वहाँ यमकालंकार होता है। यथा :— मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ विदेह विदेह विसेखी ॥ यहाँ एक विदेह तो जनकजीके लिए आया है और दूसरा 'शरीरज्ञान-शून्य' के लिए। २—'देह-दुति दामिनी'—मुक्तिके पास पहुँचानेवाली दूतीके शरीरकी कान्ति बिजलीके समान कही गयी है। क्योंकि अज्ञान अन्धकारमय है और विज्ञान प्रकाशमय । मुक्ति ऐसी वस्तु नहीं, जो विज्ञानका प्रकाश हुए बिना प्राप्त हो सके । वेद-वाक्य है :— “ऋते ज्ञानान्न-मुक्तिः” अर्थात् ज्ञान हुए बिना मुक्ति नहीं होती। इसीसे ग्रंथकारने आरतीरूपी दूतीके शरीरको तीक्ष्ण प्रकाशपूर्ण कहा है। ३—'महिषेस बहु कालिका'— भगवती कालिकाने प्रमादी महिषासुर नामक दैत्यका वध करके संसारमें शान्ति स्थापित की थी। यह कथा देवी- भागवतमें विस्तारपूर्वक है।

विनय-पत्रिका ८९ हरिशंकरी पद ( ४९ ) देव— दनुज-वन-दहन, गुन-गहन, गोबिंद- नंदादि-आनंद-दाताऽविनासी। संभु, सिव, रुद्र, संकर, भयंकर, भीम, घोर, तेजायतन, क्रोध-रासी ॥१॥ अनंत, भगवंत, जगदंत-अंतक-त्रास- समन, श्रीरमन, भुवनाभिरामं। भूधराधीस जगदीस ईसान, विज्ञानघन, ज्ञान-कल्याण-धामं ॥२॥ वामनाव्यक्त, पावन, परावर विभो, प्रगट परमातमा, प्रकृति-स्वामी। चन्द्रसेखर, सूलपानि, हर, अनघ, अज, अमित, अविछिन्न, वृषभेस-गामी ॥३॥ नील जलदाभ तनु स्याम, बहुकाम छवि, राम राजीव लोचन कृपाला। कंबु-कर्पूर-वपु, धवल, निर्मल मौलि, जटा, सुर-तटिनि, सित सुमनमाला ॥४॥ वसन किंजल्कधर, चक्र-सारंग-दर- कंज-कौमोदकी अति विसाला। मार-करि मत्त मृगराज, त्रैनैन हर, नौमि अपहरन संसार-जाला ॥५॥ कृष्ण, करुनाभवन, दवन कालीय खल, विपुल कंसादि निर्वंसकारी। त्रिपुर-मद-भंगकर, मत्त गज-चर्मधर, अन्धकोरग-ग्रसन पन्नगारी ॥६॥

९० विनय-पत्रिका ब्रह्म, व्यापक, अकल, सकल-पर, परमहित, ग्यान, गोतीत गुन-वृत्ति-हर्त्ता। सिंधुसुत-गर्व-गिरि-बज्र, गौरीस, भव दच्छ-मख अखिल विध्वंसकत्र्ता ॥७॥ भक्ति प्रिय, भक्तजन-कामधुक धेनु, हरि, हरन दुर्घट विकट विपति भारी। सुखद, नर्मद, वरद, विरज, अनवद्यऽखिल, विपिन-आनंद-वीथिन-विहारी ॥८॥ रुचिर, हरिसंकरी नाम-मंत्रावली द्वन्द्वदुख हरनि, आनंदखानी। विष्णु-सिव-लोक-सोपान-सम सर्वदा वदति दास तुलसी विसद वानी ॥९॥ शब्दार्थ—अविनासी = जिसका कभी नाश न हो। जगदंत = संसारका अन्त करने- वाले। अंतक = काल। ईसान = ईशान कोणके स्वामी अर्थात् शिवजी। अनघ = पापरहित। किंजल्क = कमल-केसर। दर = शंख। कौमोदकी = गदा। कालीय = कालिय दैत्य। उरग = सर्प। वरद = वर देनेवाले। वीथिन = गलियों। विसद = शुद्ध या पवित्र। [ गुसाईंजीने इस पदका नाम 'हरिशंकरी पद' रखा है; क्योंकि उन्होंने इस पदके एक पक्षमें विष्णुकी और दूसरेमें शिवकी एक साथ स्तुति करके हरिहरमें अभेद सिद्ध किया है । ] आरम्भमें जो 'देव' शब्द है, उसे प्रत्येक पक्षका सम्बोधन समझना चाहिये। भावार्थ—हे देव ! आप दैत्यरूपी वनको जलानेवाले, सद्गुण-समूह, इन्द्रियोंके अधीश्वर तथा नन्द-उपनन्द आदिको आनन्द देनेवाले और अविनाशी हैं। हे देव ! आप शम्भु, शिव, रुद्र, शंकर आदि नामोंसे विख्यात हैं। आप बड़े ही भयंकर, महान् तेजस्वी तथा (खलोंके लिए) क्रोधकी राशि हैं ॥१॥ हे देव ! आपका अन्त नहीं है; आप छ प्रकारके ऐश्वर्योंसे युक्त हैं, संसारका अन्त करनेवाले, कालके भयको दूर करनेवाले, लक्ष्मीजीके स्वामी और विश्वब्रह्मांडको आनन्द देनेवाले हैं।

विनय-पत्रिका ९१ हे देव ! आप कैलाशगिरिके मालिक, जगत्के स्वामी, ईशान, विज्ञानघन और ज्ञान तथा कल्याणके स्थान हैं ॥२॥ हे देव ! आप वामनरूप, अव्यक्त, पवित्र, जड़-चैतन्यके स्वामी, साक्षात् परमात्मा और प्रकृतिके स्वामी हैं । हे देव ! आप चन्द्रमाको मस्तकपर और त्रिशूलको हाथमें धारण करनेवाले, सृष्टिके संहारकर्त्ता, निष्पाप, अजन्मा, सीमा-रहित, अखंड और नन्दीपर सवार होकर चलनेवाले हैं ॥३॥ हे देव ! आपके श्यामल शरीरकी आभा नीले मेघके समान है, शोभा अनेक कामदेव-सदृश है, आप राम हैं, कमलनेत्र हैं और कृपालु हैं । हे देव ! आपका उज्ज्वल शरीर शंख और कपूरके समान निर्मल है; आपके मस्तकपर जटा-जूट और गंगाजी हैं । आप सफेद फूलोंकी माला पहने हुए हैं ॥४॥ हे देव ! आप कमल-केसरके समान पीताम्बर तथा चक्र, धनुष, शंख और अत्यन्त विशाल गदा धारण किये हैं । हे देव ! आप कामदेवरूपी हाथीके लिए सिंह, तीन नेत्रवाले और संसारका कष्ट दूर करनेवाले हैं । अतः हे हर, मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥५॥ हे देव ! आप कृष्ण हैं अर्थात् अपने रूप-माधुर्यसे सबको आकर्षित करने- वाले हैं, करुणाके स्थान हैं, कालिय नागका नाश करनेवाले हैं तथा कंस आदि बहुत-से दुष्टोंका निर्वंश करनेवाले हैं । हे देव ! आप त्रिपुर दैत्यका घमण्ड तोड़नेवाले, मतवाले हाथीका चमड़ा धारण करनेवाले तथा अन्धकासुररूपी सर्पको निगलनेके लिए गरुड़ हैं ॥६॥ हे देव ! आप ब्रह्म, सबमें व्याप्त, कला-रहित, सबसे परे, हितैषी, साधारण ज्ञान और इन्द्रियोंसे न्यारे तथा मायिक वृत्तियोंको हरनेवाले हैं । हे देव ! आप जलन्धरके गर्वरूपी पर्वतको चूर्ण करनेके लिए वज्ररूपी, पार्वतीके पति, संसारकी उत्पत्तिके स्थान और दक्ष प्रजापतिके सम्पूर्ण यज्ञका विध्वंस करनेवाले हैं ॥७॥ हे देव ! आपको भक्ति बहुत प्रिय है, आप अपने भक्तोंकी इच्छा पूरी करने-

९२ विनय-पत्रिका के लिए कामधेनुके समान हैं, आप हरि हैं और दुर्घट, विकट तथा महान् विपत्तियोंको हरनेवाले हैं । हे देव आप सुखदाता, आनन्ददाता, इच्छित वरदाता, विरक्त, तमाम विकारों और दोषोंसे रहित एवं आनन्द-वन काशीकी गलियोंमें विहार करने- वाले हैं ॥८॥ हे देव ! इस मनोहर हरिशंकरीके नाम-मंत्रोंकी पंक्तियाँ राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे उत्पन्न दुःखको हरनेवाली तथा आनन्दकी खानि हैं । तुलसीदास शुद्ध वाणीसे कहता है कि ये विष्णु तथा शिवलोकमें जानेके लिए सदैव सीढ़ीके समान हैं ॥९॥ विशेष १—'वामन'—विष्णु भगवान्‌ने राजा बलिसे तीन पैर पृथिवी लेनेके लिए वामन (बौना) रूप धारण किया था । २—'कालिय' नामक एक भयंकर सर्प था जो कि यमुनामें रहता था । उसके विषकी ज्वालासे वहाँका पानी हमेशा खौला करता था । भगवान् श्रीकृष्णने उसे नाथकर अपने वशमें कर लिया, पीछे वह यमुनाको छोड़कर समुद्रमें चला गया । यह कथा श्रीमद्भागवतमें है । ३—'अन्धक'—नामक एक दैत्य था । वह बहुत ही उपद्रवी और बलवान् था । वह हिरण्याक्षका पुत्र था । उसने ब्रह्मासे यह वर प्राप्त किया था कि ज्ञान प्राप्त हुए बिना मेरी मृत्यु कदापि न हो । यह वर मिलनेके बाद उसने तीनों लोकोंको जीत लिया । देवता लोग उसके भयसे मन्दराचल पहाड़पर चले गये । वह दुष्ट वहाँ भी पहुँचकर उन्हें दुःख देने लगा । देवताओंने आर्त स्वरमें शिवजीको पुकारा । शिवजीने आकर उसे मार डाला । यह कथा शिव- पुराणमें है । ३—'सिंधु-सुत'—या जलन्धर बड़ा प्रतापी राजा था । इसने देवलोकको जीत लिया था । शिवजीने इसे मारना चाहा, पर उन्हें सफलता नहीं मिली, क्योंकि जलन्धरकी स्त्री वृन्दा पतिव्रता थी । जब विष्णुने बलपूर्वक वृन्दाका सतीत्त्व नष्ट किया, तब शिवजीने जलन्धरको परास्त किया । उस समय वृन्दाने विष्णुको शाप दिया कि किसी समय मेरा पति रावणका अवतार लेकर तुम्हारी स्त्रीका हरण करेगा ।

४—'दच्छमख'—दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम सती था। उनका विवाह शिवजीके साथ हुआ था। एक बार ब्रह्माके यहाँ दक्ष पहुँचा। सब देवताओँने उठकर उसकी अभ्यर्थना की, पर शिवजी नहीं उठे। इससे दक्ष बहुत नाराज हुआ। इसका बदला लेनेके लिए उसने खूब धूमधामसे यज्ञ किया, और उसमें सब देवताओँको आमन्त्रित किया, पर शिवको नहीं पूछा। यज्ञका हाल सुनकर सती बिना बुलाये ही अपने पिताके घर चली गयीं। वहाँ उन्हें शिवजीका भाग दिखलाई नहीं पड़ा। इससे वह क्रुद्ध होकर अपने पिता- को कटु वाक्य कहने लगीं और योगाग्निमें जलकर भस्म हो गयीं। यह समाचार पाकर शिवजीने वीरभद्रको भेजा और उसने वहाँ जाकर शिवजीकी आज्ञासे दक्ष प्रजापतिका यज्ञ भंग कर दिया। पीछे शिवजीने प्रसन्न होकर यज्ञका पुनरुद्धार किया। यह कथा शिवपुराणमें विस्तारपूर्वक है। ५—विष्णु और शिवमें अभेदसम्बन्ध है। लिखा है:— सदैव देवो भगवान् महादेवे न संशयः। मन्यन्ते ये जगद् योनिं विभिन्नं विष्णुमीश्वरात्। —इति कौर्मे, १३ अध्यायः ६—'संभु सिव रुद्र संकर'—पर्यायवाची शब्द हैं, पर सबका भिन्न-भिन्न आशय है। ७—'भयंकर भीम घोर'—का आशय भी अलग-अलग है। यथा 'भयंकर' का अर्थ 'भयजनक', 'भीम' का अर्थ 'भयके हेतु', 'घोर' का अर्थ 'विष' अर्थात् 'हलाहल पान करके आश्चर्यजनक भीषण काम करनेवाले' इत्यादि।

( ५० )

देव— भानुकुल-कमल-रवि, कोटि कंदर्प छवि, काल-कलि-व्यालमिव वैनतेयं। प्रबल भुजदंड प्रचंड कोदंड-धर, तूनवर विसिख बलमप्रमेयं ॥ १ ॥