विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० विनय-पत्रिका विशेष १—'कलधौत मनि-मुकुट'—से सिद्ध होता है कि गोस्वामीजी राज्यसिंहा- सनासीन प्रभुमूर्तिका ही ध्यान करते थे; क्योंकि मुकुट उसी अवस्थाका द्योतक है। उनकी यह भावना अन्य स्थलोंपर भी प्रकट होती है। कविने और भी कई जगह रूपका वर्णन किया है, पर मुकुट-रहित। किन्तु ध्यानके लिए भक्तोंको यही रूप अधिक प्रिय है। २—'शम-दम-दया दान'—शम नाम है अन्तःकरण, मन, बुद्धि आदिके निग्रहका, दम नाम है बाह्येन्द्रियों (कान आँख आदि) के निग्रहका, दया नाम है मन-वचन-कर्मसे जीवमात्रको पीड़ा न पहुँचाने का और दान नाम है अन्न- वस्त्रादि देनेका। ३—'वारांनिधे—शब्दपर वियोगी हरिजीने यह टिप्पणी दी है:—'यह पद संस्कृत व्याकरणसे अशुद्ध है। 'वारिगाम् निधि' अथवा 'वारिनिधि' शुद्ध है....' (प्रथम संस्करण हरितोषिणी टीका); किन्तु वियोगी हरिजीके इस भ्रमको आचार्य पं० रामचन्द्रजी शुक्लने पुस्तकके परिचयमें दूर कर दिया है। 'वारांनिधि' शब्द व्याकरणसे अशुद्ध नहीं है। संस्कृतमें 'वारि' और 'वार' दोनों शब्द जल- वाचक हैं। इस 'वार' शब्दका सम्बन्धका रूप 'वारां' होगा, जिसमें अलुक् समासकी रीतिसे 'निधि' शब्द जोड़ा गया है। राग गौरी ( ४५ ) श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरन भव-भय दारुनं । नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद कंजारुनं ॥१॥ कंदर्प अगनित अमित छवि, नवनील नीरद सुंदरं । पट पीत मानहु तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक-सुतावरं ॥२॥ भजु दीनबंधु दिनेस दानव-दैत्य-वंस-निकंदनं । रघुनंद आनंदकंद कोसलचंद दसरथ-नंदनं ॥३॥