भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 475 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 92

विनय-पत्रिका ८१ सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषनं । आजानुभुज सर-चाप-धर, संग्राम-जित-खर दूषनं ॥४॥ इति वदति तुलसीदास संकर-सेष मुनि-मन रंजनं । मम-हृदय-कंज-निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ॥५॥ शब्दार्थ—कंजारुन = (कंज+अरुन) लाल कमल। कन्दर्प = कामदेव। नीरद = बादल। उदारु = सुन्दर। आजानुभुज = घुटनोंतक लम्बी भुजावाले। रंजन = प्रसन्न करने- वाले। गंजन = नाशकर्ता। भावार्थ—रे मन ! संसारके भयंकर भयको हरनेवाले कृपालु श्रीरामचन्द्रको भज। उनके नेत्र नव-विकसित कमलके समान हैं; मुख कमल-सदृश है; हाथ और चरण भी लाल कमलके सदृश हैं ॥१॥ उनकी छवि अगणित कामदेवोंसे बढ़- कर है और शरीर नवीन नीले मेघ जैसा सुन्दर है। मेघ-रूपी शरीरपर पीताम्बर मानो बिजलीकी तरह चमक रहा है, ऐसे पवित्ररूप जानकीनाथ श्रीरघुनाथजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥२॥ रे मन ! दीनोंके बन्धु, सूर्यके समान तेजस्वी, दैत्य- दानव-वंशका मूलोच्छेद करनेवाले, आनन्दकन्द कोशलदेश-रूपी आकाशमें चन्द्रमाके समान दशरथ-नन्दन श्रीरामजीका भजन कर। वह सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल, मस्तकपर सुन्दर तिलक और मनोहर अंग-प्रत्यंगमें आभूषण धारण करनेवाले, आजानुबाहु, धनुष-बाणधारी तथा संग्राममें खर-दूषणको जीतने- वाले हैं ॥४॥ तुलसीदास इतना ही कहता है कि शंकर, शेष और मुनियोंके मनको प्रसन्न करनेवाले तथा काम-क्रोधादि दुष्टोंका नाश करनेवाले हे रघुनाथ- जी ! आप मेरे हृदयकमलमें निवास कीजिये ॥५॥ विशेष १—‘मम हृदय-कंज...गंजन’—कहनेका आशय यह है कि आप कामादि खल-दल-गंजन हैं, अतः मेरे हृदयसे इन दोषोंको निकाल दीजिये । इनका नाश होते ही मेरा हृदय विकसित हो जायगा। इसीसे कविने हृदय-कंजका प्रयोग किया है। ६