विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ विनय-पत्रिका राग रामकली ( ४६ ) सदा राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, मूढ़ मन, वार वारं। सकल सौभाग्य-सुख-खानि जिय जानि सठ, मानि विस्वास वद वेदसारं ॥ १ ॥ कोसलेन्द्र नव-नीलकंजाभतनु, मदन-रिपु-कंज हृदि-चंचरीकं । जानकीरवन सुखभवन भुवनैकप्रभु, समर-भंजन, परम कारुनीकं ॥ २ ॥ दनुज-वन-धूमधुज पीन आजानुभुज, दंड-कोदंड वर चंड वानं । अरुन कर चरन मुख नयन राजीव, गुन-अयन, वहु-मयन-सोभा-निधानं ॥ ३ ॥ वासनावृंद-कैरव-दिवाकर, काम- क्रोध-मद-कंज कानन-तुषारं । लोभ अति मत्त नागेन्द्र पंचाननं भक्तहित हरन संसार-भारं ॥ ४ ॥ केसवं, क्लेसहं, केस-वन्दित पद- द्वंद मन्दाकिनी-मूलभूतं । सर्वदानंद-संदोह, मोहापहं घोर-संसार-पाथोधि-पोतं ॥ ५ ॥ सोक-सन्देह-पाथोदपटलानिलं, पाप-पर्वत-कठिन-कुलिसरूपं । संतजन-कामधुक-धेनु, विश्रामपद, नाम कलि-कलुष-भंजन-अनूपं ॥ ६ ॥