विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ८३ धर्म-कल्पद्रुमाराम, हरिधाम-पथि- संवलं, मूलमिदमेव एकं । भक्ति-वैराग्य-विग्यान-सम-दान-दम, नाम आधीन साधन अनेकं ॥ ७ ॥ तेन तप्तं, हुतं, दत्तमेवाखिलं, तेन सर्वे कृतं कर्मजालं । येन श्रीरामनामामृतं पानकृत- मनिसमनवद्यमवलोक्य कालं ॥ ८ ॥ सुपच, खल, भिल्ल, जमनादि हरिलोकगत, नाम बल बिपुल मति मलिन परसी । त्यागि सब आस, संत्रास, भवपास असि निसित हरिनाम जपु दास तुलसी ॥ ९ ॥ शब्दार्थ—वद=कह । नव-नीलकंजाम=नवीन नीले कमलके समान आभा । हृदि=हृदयमें । चंचरीक=भ्रमर । चंड=प्रचंड । कैरव=कुमुदिनी । नागेन्द्र=गजेंद्र । पंचाननं=सिंह । क्लेसहं=क्लेशहन्ता । केस=क+ईश) ब्रह्मा और शिव । संदोह= समूह । पोतं=जहाज । पाथोदपटलानिलं=मेघसमूहके लिए पवनरूप । कल्पद्रुम+ आराम=कल्पवृक्षका बगीचा । संबल=कलेवा, राहखर्च । मूलमिदमेव=(मूलम्+इदम्+ एव) यही मूल है। पानकृतम्+अनिशं (बारम्बार)+अनवद्यम् (अखंड)+अवलोक्य (देखने योग्य) । निसित=तीक्ष्ण, पैनी । भावार्थ—रे मूढ़ मन ! हमेशा और बारम्बार राम-नामका जप कर । रे शठ ! यह जप सब सौभाग्य और सुखोंकी खानि है, ऐसा जीमें जानकर तथा यही 'वेदोंका सार' है, इसपर विश्वास मानकर राम राम कहा कर ॥१॥ कोश- लेन्द्र श्रीरामजीके शरीरकी आभा नवीन नीले कमलके समान है। वह शिवजीके हृदयमें विचरण करनेवाले भ्रमर हैं । वह सीता-वल्लभ, आनन्द-निधान, विश्व- ब्रह्मांडके एकमात्र स्वामी, युद्धमें खलोंके नाशकर्ता तथा अत्यन्त कारुणिक हैं ॥२॥ वह दैत्य-समूहरूपी वनके लिए अग्निके समान हैं और पुष्ट आजानु-भुज-दंडोंमें सुन्दर धनुष एवं तीखे बाण धारण किये हुए हैं । उनके हाथ, पैर, मुख और नेत्र लाल कमलके सदृश हैं; वह सर्वगुण-निधान तथा अनेक कामदेवोंकी शोभाके