विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ७९ उनकी वन्दना करने लगे। आप लोकपाल-रूपी चक्रवाकोंके शोक-सन्तापका नाश करनेवाले तथा सूर्यवंश-रूपी कमल-वनको विकसित करनेवाले हैं ॥२॥ जय हो ! आपके शरीरकी शोभा शृंगार-रूपी सरोवरमें उत्पन्न हुए नीले कमलों- की आभाके समान है। आप गुणोंके धाम हैं और संसारका उपकार करनेवाले तथा सब प्रकारके सौभाग्य, सौन्दर्य एवं शोभायुक्त रूपसे करोड़ों कामदेवोंका गर्व हरनेवाले हैं ॥३॥ जय हो ! आप सुन्दर धनुष, तरकस, बाण, शक्ति, ढाल, तलवार और श्रेष्ठ कवचधारी, धर्मका भार वहन करनेमें धीर तथा रघुवंशमें सर्वश्रेष्ठ वीर हैं। आपकी भुजाओंमें अतुलित बल है जो कि लीलापूर्वक पृथिवीके भारी भारस्वरूप राक्षसोंको दलित करनेवाला है ॥४॥ श्रीरामजीकी जय हो ! आप मणि-जटित सुवर्णका मुकुट और मकराकृति कुण्डल धारण किये हैं। आपके सुन्दर ललाटपर तिलक झलक रहा है। आपके मुखकी शोभा चन्द्रमाके समान है। आप दिव्य आभूषण, पीताम्बर और यज्ञोपवीत धारण किये रहते हैं। आपके इस स्वरूपका ध्यान करके ऐसा कौन है जो कल्याणका भागी नहीं हुआ ॥५॥ जय हो ! आप भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नसे सेवित एवं सुमुख-सुमंत आदि मन्त्रियों और भक्तोंको सुखदायिनी सब वस्तुएँ देनेवाले, अधम, दुखी, दीन, पतित और महान् पापियोंके केवल एक बार 'रक्षा करो' कहकर प्रणाम करनेसे ही उद्धार करनेवाले हैं ॥६॥ जय हो ! जिनका यश चौदहो भुवनोंमें जगमगा रहा है, जो पुण्यमय और धन्य हैं, उन महाराज श्रीरामजीकी जय हो ! जिनकी कथा-रूपी गंगा आदिकवि महर्षि बाल्मीकि-रूपी पर्वतसे निकली है और जिसे पान करके तथा जिसमें स्नान करके सन्त-समाज हर्षित होता है, उन रामजीकी जय हो ॥७॥ हे रामजी ! आपकी जय हो ! आपके शासनकालमें चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और चारों आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ, संन्यास) अपने-अपने आचारपर चलनेवाले थे, समस्त स्त्री-पुरुष सत्य, शम, दम, दया और दानी स्वभाववाले, दुःखों और दोषोंसे रहित, सदा सन्तोषी और सुखी थे तथा आपके राज्यकी लीला सुना और गाया करते थे ॥८॥ हे वैराग्य और विज्ञानके समुद्र श्रीरामजी ! आपकी जय हो ! हे पाप-सन्तापहर्त्ता ! आप प्रणाम करते ही आनन्द देनेवाले हैं। अतः हे संशयको दूर करनेवाले जानकी- नाथ ! यह तुलसीदास आपकी शरणमें है, इसे अपने चरणोंका सहारा दीजिये ॥