भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 99

८८ विनय-पत्रिका भावार्थ—श्रीरामजीकी आरती सब क्लेशोंको हर लेती है। वह दुःख- दोषोंको जला डालती तथा कामनाओं या इच्छाओंको निर्मूल कर डालती है ॥१॥ वह सुन्दर सुगन्धयुक्त धूप श्रेष्ठ दीपकोंकी माला है। उस आरतीके समय हाथोंकी तालीका शब्द सुनकर पापरूपी पक्षी उड़ जाते हैं ॥२॥ वह भक्तोंके हृदय-मन्दिरसे अज्ञानान्धकारको दूर करनेवालो तथा (हृदयमें) निर्मल विज्ञान- मय प्रकाशको फैलानेवाली है ॥३॥ वह मोह, मद, क्रोध, कलिरूपी कमलोंको मुरझानेके लिए बर्फीली रात है, मुक्ति-रूपी नायिकासे मिलानेके लिए बिजलीके समान चमकदार शरीरवाली दूती है ॥४॥ वह शरणागत भक्त-रूपी कुमुदिनीके वनको विकसित करनेके लिए चन्द्रमाकी किरण-माला है। तुलसीदास कहते हैं कि वह अभिमानरूपी महिषासुरके लिए अगणित कालिका देवीके समान है ॥५॥ विशेष १—‘आरती आरती' में यमकालंकार है। जब एक ही शब्द भिन्न-भिन्न अर्थमें कई बार आता है, तो वहाँ यमकालंकार होता है। यथा :— मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ विदेह विदेह विसेखी ॥ यहाँ एक विदेह तो जनकजीके लिए आया है और दूसरा 'शरीरज्ञान-शून्य' के लिए। २—'देह-दुति दामिनी'—मुक्तिके पास पहुँचानेवाली दूतीके शरीरकी कान्ति बिजलीके समान कही गयी है। क्योंकि अज्ञान अन्धकारमय है और विज्ञान प्रकाशमय । मुक्ति ऐसी वस्तु नहीं, जो विज्ञानका प्रकाश हुए बिना प्राप्त हो सके । वेद-वाक्य है :— “ऋते ज्ञानान्न-मुक्तिः” अर्थात् ज्ञान हुए बिना मुक्ति नहीं होती। इसीसे ग्रंथकारने आरतीरूपी दूतीके शरीरको तीक्ष्ण प्रकाशपूर्ण कहा है। ३—'महिषेस बहु कालिका'— भगवती कालिकाने प्रमादी महिषासुर नामक दैत्यका वध करके संसारमें शान्ति स्थापित की थी। यह कथा देवी- भागवतमें विस्तारपूर्वक है।