भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 87

७६ विनय-पत्रिका कुसमय समझकर अस्वीकार कर दिया, पर पातिव्रत धर्म समझकर पीछे उसे उसके प्रस्तावसे सहमत होना पड़ा। सम्भोगके बाद ही गौतम ऋषि आ गये। उन्होंने योगबलसे सब रहस्य जान लिया और क्रुद्ध होकर इन्द्रको शाप दिया कि तेरे एक सहस्र भग हो जायँ, तथा अहिल्याको शाप दिया कि तू पत्थर हो जा। पश्चात् जब उनका क्रोध शान्त हुआ तो उन्होंने दोनोंके शापका प्रतिकार बतलाया। कहा, जब श्रीरामजी शिव-धनुषको तोड़ेंगे, तब इन्द्रके सहस्र भग सहस्र-नेत्रोंके रूपमें परिणत हो जायँगे और श्रीरामजीके चरणस्पर्शसे अहिल्या- का उद्धार हो जायगा। ४—'भृगुनाथ नतमाथ'—रामजीके धनुष तोड़नेपर परशुरामने आकर बहुत क्रोध किया था। उन्हें अपने बल-वीर्यका बड़ा घमण्ड था। उन्होंने इक्कीस बार क्षत्रिय राजाओंको जीतकर समूची पृथिवीका दान कर दिया था। किन्तु रामजीके सामने अन्तमें उन्हें भी सिर झुकाना पड़ा था। ५—'पाकारिसुत'—इन्द्रका पुत्र जयन्त कौएका वेष धारण करके श्रीरामजीका बल देखने आया और सीताके चरणोंमें चोंच मारकर भागा। श्रीरामजीने सींकका धनुष-बाण बनाकर उसे मारा। उसने नकली वेष धारण किया था, इसलिए श्रीरामजीने उसपर नकली बाण चलाकर ही अपने बाणके प्रभुत्वका दिग्दर्शन कराना उचित समझा। अभागा जयन्त व्याकुल होकर भागने लगा, पर जब पीछे फिरकर देखता तो बाण उसके पीछे लगा रहता। ब्रह्मलोक, शिवलोक, इन्द्रपुर तथा और तमाम लोकोंमें घूम आया, किन्तु कहीं उसे शरण न मिली। अन्तमें उसे श्रीरामजीकी शरण लेनी पड़ी। भगवान्‌को दया आ गयी, अतः उन्होंने उसके प्राण नहीं लिये, केवल एकाक्ष करके छोड़ दिया। कहते हैं तभीसे कौओंके एक ही पुतली होती है। ६—विराध और कबन्ध ये दोनों राक्षस थे। भगवान्‌ने इनका वध किया था। ७—'दिव्य देवी वेष देखि लखि निसिचरी'—में 'देखि' 'लखि' ये दोनों शब्द एक ही अर्थके बोधक होनेके कारण पुनरुक्तिसे दूषित दिखाई पड़ते हैं; किन्तु यहाँ पुनरुक्ति-दोष नहीं है। देखना, बाह्य चक्षुका विषय है और 'लखने' में मनश्चक्षुके विषयकी झलक है। श्रीरामजीने सूपर्णखाको देवी रूपमें देखा,

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