भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 88

विनय-पत्रिका ७७ इसके लिए तो कविने देखि लिखा और यह देवी नहीं सूपर्णखा राक्षसी है, यह जान लिया, इसके लिए उन्होंने 'लखि' शब्दका प्रयोग किया । ८—'करुना'—भक्तवर बैजनाथजीने 'करुणा'के सम्बन्धमें लिखा है:— सेवक दुखतें दुखित है, स्वामि विकल है जाइ। दुःख निवारे सीघ्र ही, 'करुना' गुन सों आइ ॥ ( ४४ ) जयति राज-राजेन्द्र राजीवलोचन, राम, नाम कलि-कामतरु, साम साली। अनय-अंभोधि-कुंभज, निसाचर-निकर- तिमिर घनघोर खर किरनमाली ॥१॥ जयति मुनिदेव नरदेव दशरथके, देव-मुनिवंद्य किय अवध-वासी। लोकनायक-कोक-सोक-संकट-समन, भानुकुल-कमल-कानन - विकासी ॥२॥ जयति सिंगार-सर तामरस-दामदुति- देह, गुनगेह, विस्वोपकारी। सकल सौभाग्य-सौंदर्य सुषमारूप, मनोभव कोटि गर्वापहारी ॥३॥ जयति सुभग सारंग सुनिषंग सायक सक्ति, चारु चर्मासि वर वर्मधारी। धर्मधुरधीर, रघुवीर, भुज-बल अतुल, हेलया दलित भूभार भारी ॥४॥ जयति कलधौत मनि-मुकुट, कुंडल, तिलक, झलक भलिभाल, विधु-वदन-सोभा। दिव्य भूषन, वसन पीत, उपवीत, किय ध्यान कल्यान-भाजन न को भा ॥५॥