भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 86

विनय-पत्रिका ७५ की नाक और कान काटनेवाले) श्रीरामचन्द्रजी ! आपकी जय हो ! ॥५॥ आप खर, त्रिशिरा, दूषण, उनकी चौदह हजार सेना तथा मारीचके संहारकर्त्ता हैं। आप गृद्ध और शबरीकी भक्तिके वशमें हो जानेवाले, करुणाके समुद्र, निष्कलंक चरित्रवाले तथा तीन प्रकारके (दैहिक, दैविक, भौतिक) दुःखोंको हरनेवाले हैं ॥६॥ आपकी जय हो ! आपने मदान्ध और दुष्ट कबन्धको मारा तथा महाबलवान् बालिका वध करके सुग्रीवको राजा बनाया। आपने अच्छे-अच्छे योद्धा बन्दरों और रीछोंकी सेना संघटित करके सजायी और पैरोंपर गिरते ही विभीषणको निहाल कर दिया ॥७॥ जय हो ! आपने लीलाके ही लिए समुद्रपर पुलका निर्माण किया, जो लंकापुरी कालके मनके लिए भी अगम थी, उसे आप धुनमें आकर ले बीते और कुल-सहित, भाई-सहित और दल-बल-सहित रावणको रणभूमिमें कुचलकर तीनों लोकों एवं इन्द्र-कुबेरादि लोकपालोंको निःशंक कर दिया ॥८॥ श्रीरामजीकी जय हो ! (उसके बाद) आप लक्ष्मण, सीता और सुग्रीव हनुमान् आदि मंत्रियों-सहित पुष्पक विमानपर बैठकर अपनी राजधानी अयोध्या- को चले। तुलसीदास कहते हैं कि रामचन्द्रजीके राजा होनेपर तथा सीताजीके रानी होनेपर समस्त अयोध्यानिवासी आह्लादित हो गये ॥९॥ विशेष १—गुसाईंजीने इस पदमें रामावतारके चरित्रका आद्योपान्त स्मरण किया है। यहाँ रामावतारकी एक भी मुख्य घटना छूटने नहीं पायी है। २—'ऋषि-मखपाल'—विश्वामित्रके आश्रमके पास राक्षसोंने इतना उत्पात मचा रखा था कि वह बेचारे निर्विघ्न तपस्या ही नहीं करने पाते थे। अतः वह यज्ञकी रक्षाके लिए राम-लक्ष्मणको अयोध्यासे अपने आश्रममें ले गये। रामजी- ने लक्ष्मणको साथ लेकर मुनिके यज्ञकी रक्षा की और बहुत-से उत्पाती राक्षसों- को मार डाला। ३—'मुनिवधू पापहारी'—परम सुन्दरी अहिल्या गौतम ऋषिकी स्त्री थी। एक दिन सन्ध्याके समय जब कि गौतम ऋषि सन्ध्यावन्दनके निमित्त बाहर गये थे, देवराज इन्द्र गौतमका रूप धारण करके अहिल्याके पास पहुँचा। वह उसके सौन्दर्यपर मुग्ध था। उसके रतिदान माँगनेपर पहले तो अहिल्याने

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