विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्म राम तें नाम बड़, वर-दायक वर-दानि । रामचरित सत कोटि महँ, लिय महेस जिय जानि ॥ ✕ ✕ ✕ ✕ नाम कामतरु काल कराला । सुमिरत समन सकल जगजाला ॥ राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितुमाता ॥ नहिं कलि करम न भगति विवेकू । राम-नाम अवलम्बन एकू ॥ अथवा कलियुग केवल नाम अधारा । जानि लेहि जो जाननि हारा । ४—'कर्मजालं'—यों तो कर्मके कई भेद हैं और उनका उल्लेख भी पीछे किया जा चुक है, किन्तु यहाँ कर्मसे अभिप्राय है वेद-विहित कर्म । ५—'जमन'—यवन । एक मुसलमानके मुखसे मरते समय 'हराम' शब्द निकला था । उसमें 'राम' शब्द आ जानेके कारण उसकी मुक्ति हो गयी ।
( ४७ ) ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन । हरन दुखदुंद गोचिन्द आनंदघन ॥१॥ अचरचर रूप हरि, सर्वगत, सर्वदा वसत, इति वासना धूप-दीजै । दीप निजबोध गत-कोह-मद मोह-तम, प्रौढ अभिमान चितवृत्ति छीजै ॥२॥ भाव अतिसय विसद प्रवर नैवैद्य सुभ श्रीरमन परम संतोषकारी । प्रेम तांबूल गत सूल संसय सकल, विपुल भव-वासना-बीजहारी ॥३॥ असुभ-सुभकर्म-घृतपूर्न दस बर्तिका, त्याग-पावक, सतोगुनप्रकासं । भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली, अर्पि नीराजनं जग-निवासं ॥४॥