विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 97, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें८६ विनय-पत्रिका विमल हृदि-भवन कृत सांति परजंक सुभ, सयन विश्राम श्रीराम राया। छमा-करुना प्रमुख तत्र परिचारिका, यत्र हरि तत्र नहिं भेद, माया ॥५॥ एहि आरती-निरत सनकादि, श्रुति, सेष, सिव, देवऋषि, अखिल मुनि तत्व-दरसी। करै सोइ तरै, परिहरै कामादि मल, वदति इति अमल-मति दास तुलसी ॥६॥ शब्दार्थ—गोविंद = इन्द्रियोंके स्वामी । वासना = इच्छा, सुगन्ध । छीजै = नष्ट कर दे । प्रवर = श्रेष्ठ । ताम्बूल = पान । वर्तिका = बत्ती । नीराजनं = आरती । परजंक = पलँग । प्रमुख = प्रधान । निरत = तत्पर । भावार्थ—हे मन ! रघुकुलमें वीर श्रीरामजीकी आरती इस प्रकार कर । वह दुःख-द्वन्द्वों (रागद्वेषादि) के नाशक, इन्द्रियोंके स्वामी और आनन्दघन हैं ॥१॥ जड़-चेतन सब रूप परमात्माका है, वह सर्वगत और एकरस हैं—इस वासना (सुगन्ध) की धूप दे। धूपके बाद दीप चाहिये। सो आत्मज्ञानरूपी दीपकसे क्रोध-मद-मोहरूपी अन्धकारको दूर करके अभिमानभरी चित्तकी वृत्ति- योंको नष्ट कर दे ॥२॥ पश्चात् तू मङ्गलमूर्ति लक्ष्मीपति भगवान्को परम सन्तोष- कारी अपने अत्यन्त निर्मल और श्रेष्ठ भावका नैवेद्य चढ़ा। फिर, दुःख और संशयोंसे रहित होकर अपार संसारके वासनारूपी बीजको नाश करनेवाले 'प्रेम'- का ताम्बूल अर्पण कर ॥३॥ उसके बाद शुभ और अशुभ-कर्मरूपी घीसे तर की हुई दस इन्द्रियरूपी बत्तियोंको त्यागरूपी आगसे जलाकर सतोगुण-रूपी प्रकाश कर । इस प्रकार भक्ति, वैराग्य और विज्ञानरूपी दीपावलीकी आरती अर्पित करके संसारमें निवास कर ॥४॥ आरती करनेके बाद अपने निर्मल हृदयरूपी गृहमें शान्तिरूपी कल्याणकारी पलँगके ऊपर महाराज रामचन्द्रजीको सुलाकर विश्राम करा। वहाँ क्षमा और करुणा सरीखो प्रमुख सेविकाओंको नियुक्त कर दे। जहाँ प्रभुजी रहते हैं, वहाँ न तो भेद-बुद्धि रहती है और न माया ही ॥५॥ सनक-सनन्दन-सनातन-सनत्कुमार, वेद, शेष, शिव, नारद और समस्त तत्त्वदर्शी मुनि इस आरतीमें तत्पर रहते हैं। तुलसीदास कहते हैं कि जो कोई ऐसी आरती