भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 74

विनय-पत्रिका ६३ मातु-पिता, गुरु, गनपति, सारद । सिवा-समेत संभु, सुक, नारद ॥३॥ चरन बंदि बिनवौं सब काहू । देहु रामपद-नेह-निबाहू ॥४॥ बंदौं राम-लखन-वैदेही । जे तुलसी के परम सनेही ॥५॥ शब्दार्थ—निकंदन = उखाड़नेवाला। सिवा = पार्वती। सुक = शुकदेवजी। निबाहू = निर्वाह। भावार्थ—हे पवनकुमार ! तुम मंगलमूर्त्ति हो और सब संकटोंको जड़से उखाड़ देनेवाले हो ॥१॥ हे हनुमानजी ! तुम साधु पुरुषोंका हित करनेवाले हो । तुम्हारे हृदयमें रामचन्द्रजी सदा निवास करते हैं ॥२॥ माता, पिता, गुरु, गणेश, सरस्वती, पार्वतीके सहित शिव, शुकदेव तथा नारदके ॥३॥ चरणोंकी वन्दना करके सब लोगोंसे मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि रामजीके चरणोंमें मेरा जो प्रेम है, उसका निर्वाह हो जाय ॥४॥ मैं राम, लक्ष्मण और जानकीजीकी वन्दना करता हूँ, क्योंकि ये तुलसीदासके परम स्नेही हैं ॥५॥ विशेष १—गुसाईंजीने इस पदमें हनुमानजी, माता-पिता, गुरु, गणेश, शारदा, शिवपार्वती, शुकदेव, नारदादिके चरणोंकी वन्दना करके रामपद-प्रेम माँगा है । अन्तमें उन्होंने राम-लक्ष्मण-सीताकी भी वन्दना कर सूचित किया है कि अब आगेके पदोंमें केवल लक्ष्मण, जानकी और रामकी बन्दना की जायगी । लक्ष्मण-स्तुति दण्डक ( ३७ ) लाल लाड़िले लखन, हित हौ जनके । सुमिरे संकटहारी, सकल सुमंगलकारी, पालक कृपालु अपने पनके ॥१॥