विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ विनय-पत्रिका चूक चपलता मेरियै, तू बड़ो बड़ाई । होत आदरे ढीठ है, अति नीच निचाई ॥५॥ बंदिछोर विरुदावली, निगमागम गाई । नीको तुलसी दासको, तोरियै निकाई ॥६॥ शब्दार्थ—सुभ = मंगलरूप । पीर पराई = दूसरोंकी व्यथा । लोग = पुरुष । लुगाई = स्त्री (राजस्थानका शब्द है) । सगाई = सम्बन्ध । बोलिदै = बल या सहारा देकर । बरिआई = जबर्दस्ती । भावार्थ—अच्छा स्वामी सुन और समझ कर ही क्लेशके समय कठोर वचन कहा जाता है, और अच्छे स्वामी अपने स्वभावानुसार बुरे सेवकका भी भला कर देते हैं ॥१॥ यदि समर्थ, मंगलरूप और दूसरोंकी व्यथा दूर करनेमें बहादुर स्वामी मिल जाते हैं, तो उन्हें सब लोग वैसे ही देखते हैं जैसे नदी बिना बुलाये ही समुद्रकी ओर दौड़ती है (अर्थात् जैसे नदियाँ समुद्रसे मिलनेकी स्वाभाविक ही इच्छा करती हैं, वैसे ही सबलोग अच्छे स्वामीका सेवक होनेके इच्छुक होते हैं) ॥२॥ जितने स्त्री-पुरुष हैं, सब अपनी-अपनी भलाई चाहते हैं । जिसे जो अच्छा लगता है, शुभ और अशुभके सम्बन्धसे वह उसीको भजता है । तात्पर्य यह कि जो जैसी शुभ-अशुभ कामना करता है, वैसे ही देवताकी वह पूजा करता है ॥३॥ जब तुमने जबर्दस्ती अपनी भुजाओंका सहारा देकर मुझे रख लिया है, तो सेवा न करनेपर भी तुम्हें सेवकहीकी तरह उसका पालन करना चाहिये ॥४॥ भूल-चूक और चंचलता सब मेरी ही है, —तुम तो बड़े और बड़ाईके योग्य हो । आदर करनेसे नीच लोग नीचता करनेमें ढीठ हो जाते हैं ॥४॥ हे बन्दियोंको छुड़ानेवाले हनुमान्जी ! वेद और शास्त्रने तुम्हारी गुण-गाथा गायी है । तुलसी दासको केवल तुम्हारी ही अच्छाई भली है । यानी तुम दयालु हो, अतः तुलसी दासका कल्याण हो जायगा । राग गौरी ( ३६ ) मंगल-मूरति मारुत-नंदन । सकल-अमंगल-मूल-निकंदन ॥१॥ पवनतनय संतन हित-कारी । हृदय विराजत अवध-विहारी ॥२॥