भारतकोश
विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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६४ विनय-पत्रिका धरनी-धरनहार भंजन-भुवनभार, अवतार साहसी सहसफन के। सत्यसंध, सत्यव्रत, परम धरमरत, निरमल करम बचन अरु मनके ॥२॥ रूप के निधान, धनु-बान पानि, तून कटि, महाबीर विदित, जितैया बड़े रन के। सेवक-सुख-दायक, सबल, सब लायक, गायक जानकीनाथ गुनगनके ॥३॥ भावते भरत के, सुमित्रा-सीता के दुलारे, चातक चतुर राम स्याम घनके। बल्लभ उर्मिला के, सुलभ सनेह बस, धनी धन तुलसी से निरधन के ॥४॥ शब्दार्थ—लड़िले = दुलारे। सहसफन = शेषनाग। तून = तरकस। घन = बादल। बल्लभ = पति। भावार्थ—हे लाड़ले लखनलाल ! तुम राम-भक्तोंका हित करनेवाले हो। याद करनेपर संकट हर लेते हो और सब तरहसे कल्याण करते हो। तुम अपनी प्रतिज्ञाको पालनेवाले तथा कृपालु हो ॥१॥ तुम पृथिवीको धारण करनेवाले तथा चौदहो भुवनोंका भार दूर करनेवाले पराक्रमी शेषनागके अवतार हो। तुम अपने प्रण और व्रतको सत्य करनेवाले, धर्ममें अत्यन्त रत तथा निर्मल मन, वचन और कर्मवाले हो ॥२॥ तुम सुन्दरताके घर हो, हाथमें धनुष-बाण लिये रहते हो, कमरमें तरकस कसे रहते हो, विख्यात महायोद्धा हो और बड़े-बड़े युद्धोंमें विजय-लाभ करनेवाले हो॥ तुम सेवकोंको सुख देनेवाले, महा बलवान्, हर प्रकारसे योग्य तथा जानकीनाथके गुणोंका गान करनेवाले हो ॥३॥ तुम भरतजीके प्रिय, सुमित्रा और सीताजीके दुलारे तथा रामरूपी श्यामघनके चतुर चातक हो। तुम महारानी उर्मिलाके पति हो, प्रेमसे सहजमें मिलनेवाले हो और तुलसीदास-जैसे निर्धनको राम-पद-प्रेमरूपी धन देनेके लिए बड़े धनी हो ॥४॥

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