विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ६५ विशेष १—'धरनी-धरनहार—लक्ष्मणजी शेषावतार हैं। पुराणोंमें लिखा है कि यह पृथिवी वासुकिनागके फनपर स्थित है। इसीसे लक्ष्मणजीको 'धरनी-धरन- हार' कहा गया है। २—'रूपके निधान'—इनकी सुन्दरताके सम्बन्धमें लिखा है:— कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे। भरत रामहीकी अनुहारी। सहसा लखि न सकहि नर-नारी ॥ लखन सत्रुसूदन इक रूपा। नख सिखतें सब अंग अनूपा। मनभावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहँ त्रिभुवन कोउ नाहीं ॥ —रामचरितमानस ! राग घनाश्री ( ३८ ) जयति लछमनानंत भगवंत भूधर, भुजग- राज भुवनेस, भूभारहारी। प्रलय-पावक-महाज्वालमाला-वमन, समन-संताप लीलावतारि ॥१॥ जयति दासरथि, समर-समरथ, सुमित्रा- सुवन, सत्रुसूदन, राम-भरत बंधो। चारु-चंपक-वरन वसन-भूषन-धरन, दिव्यतर, भव्य, लावन्य-सिन्धो ॥२॥ जयति गाधेय-गौतम-जनक-सुख-जनक, विस्व-कंटक-कुटिल-कोटि-हंता। वचन-चय-चातुरी-परसुधर-गरब-हर, सर्वदा राम भद्रानुगंता ॥३॥ जयति सीतेस-सेवा सरस, विषय रस- निरस, निरुपाधि धुरधर्मधारी। ५