विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ विनय-पत्रिका विपुलबलमूल सार्दूल विक्रम जलद- नाद-मर्दन, महाबीर भारी ॥४॥ जयति संग्राम-सागर-भयंकर-तरन, रामहित-करन वरबाहु-सेतू। उर्मिला-रवन, कल्याण-मंगल-भवन, दास तुलसी-दोष-दवन-हेतू ॥५॥ शब्दार्थ— ज्वालमाला = लपटें । वमन = उगलना । दासरथि = दशरथके पुत्र । गाधेय = गाधिके पुत्र विश्वामित्र । जनक = उत्पन्न करनेवाले । कंटक = काँटा । कुटिल = दुष्ट । चय = समूह । परसुधर = परशुराम । भद्र = कल्याणरूप । अनुगंता = पीछे-पीछे चलनेवाले । सरस = रत । निरस = उदासीन । सार्दूल = सिंह । तरन = पार करनेवाले । भावार्थ—जय हो ! हे लक्ष्मणजी, आप अनन्त, ऐश्वर्यवान् , पृथिवीको धारण करनेवाले शेषनाग, समस्त संसारके स्वामी, पृथिवीका भार उतारनेवाले, प्रलयकालकी अग्निकी विकराल लपटें उगलनेवाले तथा लीलापूर्वक अवतार लेकर संसारके दुःखोंका नाश करनेवाले हैं ॥१॥ हे दशरथके पुत्र लक्ष्मणजी ! आपकी जय हो । आप युद्धमें समर्थ, सुमित्राके पुत्र, शत्रुघ्न, राम और भरतके भाई हैं । हे सौन्दर्यके समुद्र लक्ष्मणजी ! आपके सुन्दर शरीरका रंग चम्पा-पुष्पके समान है; आप अत्यन्त दिव्य वस्त्र और आभूषण धारण किये रहते हैं ॥२॥ आपकी जय हो ! आप विश्वामित्र, गौतम, महाराज जनकको आनन्द देनेवाले, संसारके कंटकस्वरूप करोड़ों कुटिलोंका हनन करनेवाले, चातुरीपूर्ण बातोंसे ही परशुरामजीका गर्व हरनेवाले तथा सर्वदा कल्याणरूप रामजीके पीछे-पीछे चलने- वाले हैं ॥३॥ जय हो ! आप रामचन्द्रजीकी सेवामें रत तथा विषय-रससे उदा- सीन रहनेवाले, उपाधि-रहित या कामना-रहित धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, अपार बलके मूल स्थान, सिंहवत् पराक्रमवाले, मेघनादका मर्दन करनेवाले तथा बहुत बड़े महावीर हैं ॥४॥ जय हो ! आप भयंकर युद्धरूपी समुद्रको पार करने- वाले, रामजीकी भलाई करनेके लिए आपकी श्रेष्ठ भुजाएँ पुलस्वरूप हैं। हे उर्मिलानाथ ! आप कल्याण और मंगलके घर हैं तथा तुलसीदासके दोषोंको नाश करनेके मुख्य कारण हैं। ॥५॥