विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ६७ विशेष १—'गाधेय गौतम···जनक'—लक्ष्मणजीने सुबाहु आदि राक्षसोंको मार- कर विश्वामित्रको, रामचन्द्र द्वारा अहल्याको शापमुक्त कराकर गौतमको तथा जनकपुरमें धनुष-यज्ञके समय निराश महाराज जनकको साहस देकर आनन्द प्रदान किया था। २—सीतेस सेवा···निरस'—लक्ष्मणजी भगवान् रामचन्द्रकी सेवामें इस प्रकार तल्लीन रहते थे कि उन्होंने संसारमें और किसीको कुछ समझा ही नहीं। उन्होंने वनवासके समय १४ वर्षतक अखंड ब्रह्मचर्य निभाया था। विषय- वासनाओंसे वह किस प्रकार उदासीन रहते थे, उनमें कितनी अपूर्व निष्ठा थी, इसका मुख्य प्रमाण नीचेकी कथा है— मेघनादको वर था कि जो आदमी बारह वर्ष अन्न, नींद और स्त्री-प्रसंग त्याग किये रहेगा, वही उसका वध कर सकेगा। उसने इस वरदानकी बात अपनी स्त्री सुलोचनासे कही थी। अतः जब उसकी कटी हुई भुजा सुलोचनाके सामने आकर गिरी, तब उसने विलापके साथ कहा, यह क्या हो गया ? उस समय मेघनादकी भुजाने लिख दिया कि मेरा वध लक्ष्मणजीने किया है। वह अगणित वर्षतक ब्रह्मचर्यका पालन कर चुके हैं। उनकी महिमाका वर्णन करना शेष और शारदाके लिए भी असम्भव है। भरत-स्तुति ( ३९ ) जयति भूमिजारमन-पदकंज-मकरंद-रस-रसिक-मधुकर भरत भूरिभागी भुवन-भूषन-भानु-बंस-भूषन, भूमेपालमनि रामचन्द्रानुरागी ॥१॥ जयति विबुधेस-धनदादि दुर्लभ महाराज-सम्राज-सुख-प्रद-विरागी। खङ्ग-धाराव्रती-प्रथम रेखा प्रगट सुद्धमति-जुवति पति-प्रेमपागी ॥२॥ जयति निरुपाधि भक्तिभाव-जंत्रित-हृदय,बंधु-हित चित्रकूटाद्रि-चारी पादुका नृप-सचिव-पुहुमि-पालक परम धरम-धुर-धीर बरवीर भारी३