भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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अ० १८ ] * प्रथम अंश * ८९

अठारहवाँ अध्याय

प्रह्लादको मारनेके लिये विष, शस्त्र और अग्नि आदिका प्रयोग एवं प्रह्लादकृत भगवत्-स्तुति

श्रीपराशर उवाच
तस्यैतां दानवाश्चेष्टां दृष्ट्वा दैत्यपतेर्भयात्।
आचचक्षुः स चोवाच सूदानाहूय सत्वरः ॥ १

हिरण्यकशिपुरुवाच
हे सूदा मम पुत्रोऽसावन्येषामपि दुर्मतिः।
कुमार्गदेशिको दुष्टो हन्यतामविलम्बितम् ॥ २
हालाहलं विषं तस्य सर्वभक्षेषु दीयताम्।
अविज्ञातमसौ पापो हन्यतां मा विचार्यताम् ॥ ३

श्रीपराशर उवाच
ते तथैव ततश्चक्रुः प्रह्लादाय महात्मने।
विषदानं यथाज्ञप्तं पित्रा तस्य महात्मनः ॥ ४
हालाहलं विषं घोरमनन्तोच्चारणेन सः।
अभिमन्त्र्य सहान्नेन मैत्रेय बुभुजे तदा॥ ५
अविकारं स तद्भुक्त्वा प्रह्लादः स्वस्थमानसः।
अनन्तख्यातिनिर्वीर्यं जरयामास तद्विषम् ॥ ६
ततः सूदा भयत्रस्ता जीर्णं दृष्ट्वा महद्विषम्।
दैत्येश्वरमुपागम्य प्रणिपत्येदमब्रुवन्॥ ७

सूदा ऊचुः
दैत्यराज विषं दत्तमस्माभिरतिभीषणम्।
जीर्णं तेन सहान्नेन प्रह्लादेन सुतेन ते॥ ८

हिरण्यकशिपुरुवाच
त्वर्यतां त्वर्यतां हे हे सद्यो दैत्यपुरोहिताः।
कृत्यां तस्य विनाशाय उत्पादयत मा चिरम् ॥ ९

श्रीपराशर उवाच
सकाशमागम्य ततः प्रह्लादस्य पुरोहिताः।
सामपूर्वमथोचुस्ते प्रह्लादं विनयान्वितम् ॥ १०

पुरोहिता ऊचुः
जातस्त्रैलोक्यविख्यात आयुष्मान्ब्रह्मणः कुले।
दैत्यराजस्य तनयो हिरण्यकशिपोर्भवान्॥ ११
किं देवैः किमनन्तेन किमन्येन तवाश्रयः।
पिता ते सर्वलोकानां त्वं तथैव भविष्यसि ॥ १२


**श्रीपराशरजी बोले—**उनकी ऐसी चेष्टा देख दैत्यों ने दैत्यराज हिरण्यकशिपुसे डरकर उससे सारा वृत्तान्त कह सुनाया, और उसने भी तुरन्त अपने रसोइयोंको बुलाकर कहा॥ १॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**अरे सूदगण! मेरा यह दुष्ट और दुर्मति पुत्र औरोंको भी कुमार्गका उपदेश देता है, अतः तुम शीघ्र ही इसे मार डालो॥ २॥ तुम उसे उसके बिना जाने समस्त खाद्यपदार्थों में हलाहल विष मिलाकर दो और किसी प्रकारका सोच-विचार न कर उस पापीको मार डालो॥ ३॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तब उन रसोइयोंने महात्मा प्रह्लादको, जैसी कि उनके पिताने आज्ञा दी थी उसीके अनुसार विष दे दिया॥ ४॥ हे मैत्रेय! तब वे उस घोर हलाहल विषको भगवन्नामके उच्चारणसे अभिमन्त्रित कर अन्नके साथ खा गये॥ ५॥ तथा भगवन्नामके प्रभावसे निस्तेज हुए उस विषको खाकर उसे बिना किसी विकारके पचाकर स्वस्थ चित्तसे स्थित रहे॥ ६॥ उस महान् विषको पचा हुआ देख रसोइयोंने भयसे व्याकुल हो हिरण्यकशिपुके पास जा उसे प्रणाम करके कहा॥ ७॥

**सूदगण बोले—**हे दैत्यराज! हमने आपकी आज्ञासे अत्यन्त तीक्ष्ण विष दिया था, तथापि आपके पुत्र प्रह्लादने उसे अन्नके साथ पचा लिया॥ ८॥

**हिरण्यकशिपु बोला—**हे पुरोहितगण! शीघ्रता करो, शीघ्रता करो! उसे नष्ट करनेके लिये अब कृत्या उत्पन्न करो; और देरी न करो॥ ९॥

**श्रीपराशरजी बोले—**तब पुरोहितोंने अति विनीत प्रह्लादसे, उसके पास जाकर शान्तिपूर्वक कहा॥ १०॥

**पुरोहित बोले—**हे आयुष्मन्! तुम त्रिलोकीमें विख्यात ब्रह्माजीके कुलमें उत्पन्न हुए हो और दैत्यराज हिरण्यकशिपुके पुत्र हो॥ ११॥ तुम्हें देवता, अनन्त अथवा और भी किसीसे क्या प्रयोजन है? तुम्हारे पिता तुम्हारे तथा सम्पूर्ण लोकोंके आश्रय हैं और तुम भी ऐसे ही होगे॥ १२॥