विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें९० * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० १८
तस्मात्परित्यजैनां त्वं विपक्षस्तवसंहिताम्।
श्लाघ्यः पिता समस्तानां गुरूणां परमो गुरुः॥ १३
प्रह्लाद उवाच
एवमेतन्महाभागाः श्लाघ्यमेतन्महाकुलम्।
मरीचेः सकलेऽप्यस्मिंस्त्रैलोक्ये नान्यथा वदेत्॥ १४
पिता च मम सर्वस्मिञ्जगत्युत्कृष्टचेष्टितः।
एतदप्यवगच्छामि सत्यमत्रापि नानृतम्॥ १५
गुरूणामपि सर्वेषां पिता परमो गुरुः।
यदुक्तं भ्रान्तिस्तत्रापि स्वल्पापि हि न विद्यते॥ १६
पिता गुरुर्न सन्देहः पूजनीयः प्रयत्नतः।
तत्रापि नापराध्यामीत्येवं मनसि मे स्थितम्॥ १७
यत्त्वेतत्किमनन्तेनेत्युक्तं युष्माभिरीदृशम्।
को ब्रवीति यथान्याय्यं किं तु नैतद्वचोऽर्थवत्॥ १८
इत्युक्त्वा सोऽभवन्मौनी तेषां गौरवयन्त्रितः।
प्रहस्य च पुनः प्राह किमनन्तेन साध्विति॥ १९
साधु भो किमनन्तेन साधु भो गुरवो मम।
श्रूयतां यदनन्तेन यदि खेदं न यास्यथ॥ २०
धर्मार्थकाममोक्षाश्च पुरुषार्था उदाहृताः।
चतुष्टयमिदं यस्मात्तस्मात्किं किमिदं वचः॥ २१
मरीचिमिश्रैर्दक्षाद्यैस्तथैवान्यैरनन्तः।
धर्मः प्राप्तस्तथा चान्यैरर्थः कामस्तथाऽपरैः॥ २२
तत्तत्त्ववेदिनो भूत्वा ज्ञानध्यानसमाधिभिः।
अवापुर्मुक्तिमपरे पुरुषा ध्वस्तबन्धनाः॥ २३
सम्पदैश्वर्यमाहात्म्यज्ञानसन्ततिकर्मणाम्।
विमुक्तेश्चैकतो लभ्यं मूलमाराधनं हरेः॥ २४
यतो धर्मार्थकामाख्यं मुक्तिश्चापि फलं द्विजाः।
तेनापि किं किमित्येवमनन्तेन किमुच्यते॥ २५
किं चापि बहुनोक्तेन भवन्तो गुरवो मम।
वदन्तु साधु वासाधु विवेकोऽस्माकमल्पकः॥ २६
इसलिये तुम यह विपक्षकी स्तुति करना छोड़ दो। तुम्हारे पिता सब प्रकार प्रशंसनीय हैं और वे ही समस्त गुरुओंमें परम गुरु हैं॥ १३॥
प्रह्लादजी बोले— हे महाभागगण! यह ठीक ही है। इस सम्पूर्ण त्रिलोकीमें भगवान् मरीचिका यह महान् कुल अवश्य ही प्रशंसनीय है। इसमें कोई कुछ भी अन्यथा नहीं कह सकता॥ १४॥ और मेरे पिताजी भी सम्पूर्ण जगत्में बहुत बड़े पराक्रमी हैं; यह भी मैं जानता हूँ। यह बात भी बिलकुल ठीक है, अन्यथा नहीं॥ १५॥ और आपने जो कहा कि समस्त गुरुओंमें पिता ही परम गुरु हैं—इसमें भी मुझे लेशमात्र सन्देह नहीं है॥ १६॥ पिताजी परम गुरु हैं और प्रयत्नपूर्वक पूजनीय हैं—इसमें कोई सन्देह नहीं। और मेरे चित्तमें भी यही विचार स्थित है कि मैं उनका कोई अपराध नहीं करूँगा॥ १७॥ किन्तु आपने जो यह कहा कि 'तुझे अनन्तसे क्या प्रयोजन है?' सो ऐसी बातको भला कौन न्यायोचित कह सकता है? आपका यह कथन किसी भी तरह ठीक नहीं है॥ १८॥
ऐसा कहकर वे उनका गौरव रखनेके लिये चुप हो गये और फिर हँसकर कहने लगे—'तुझे अनन्तसे क्या प्रयोजन है? इस विचारको धन्यवाद है!॥ १९॥ हे मेरे गुरुगण! आप कहते हैं कि तुझे अनन्तसे क्या प्रयोजन है? धन्यवाद है आपके इस विचारको! अच्छा, यदि आपको बुरा न लगे तो मुझे अनन्तसे जो प्रयोजन है सो सुनिये॥ २०॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चार पुरुषार्थ कहे जाते हैं। ये चारों ही जिनसे सिद्ध होते हैं, उनसे क्या प्रयोजन?—आपके इस कथनको क्या कहा जाय!॥ २१॥ उन अनन्तसे ही दक्ष और मरीचि आदि तथा अन्यान्य ऋषीश्वरोंको धर्म, किन्हीं अन्य मुनीश्वरोंको अर्थ एवं अन्य किन्हींको कामकी प्राप्ति हुई है॥ २२॥ किन्हीं अन्य महापुरुषोंने ज्ञान, ध्यान और समाधिके द्वारा उन्हींके तत्त्वको जानकर अपने संसार-बन्धनको काटकर मोक्षपद प्राप्त किया है॥ २३॥ अतः सम्पत्ति, ऐश्वर्य, माहात्म्य, ज्ञान, सन्तति और कर्म तथा मोक्ष—इन सबकी एकमात्र मूल श्रीहरिकी आराधना ही उपार्जनीय है॥ २४॥ हे द्विजगण! इस प्रकार, जिनसे अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ये चारों ही फल प्राप्त होते हैं उनके लिये भी आप ऐसा क्यों कहते हैं कि 'अनन्तसे तुझे क्या प्रयोजन है?'॥ २५॥ और बहुत कहनेसे क्या लाभ? आपलोग तो मेरे गुरु हैं; उचित-अनुचित सभी कुछ कह सकते हैं। और मुझे तो विचार भी बहुत ही कम है॥ २६॥