विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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| ९२ | * श्रीविष्णुपुराण * | [ अ० १९ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| यथा सर्वेषु भूतेषु सर्वव्यापी जगद्गुरुः।<br>विष्णुरेव तथा सर्वे जीवन्त्वेते पुरोहिताः॥ ४०<br>यथा सर्वगतं विष्णुं मन्यमानोऽनपायिनम्।<br>चिन्तयाम्यरिपक्षेऽपि जीवन्त्वेते पुरोहिताः॥ ४१<br>ये हन्तुमागता दत्तं यैर्विषं यैर्हुताशनः।<br>यैर्दिग्गजैरहं क्षुण्णो दष्टः सर्पैश्च यैरपि॥ ४२<br>तेष्वहं मित्रभावेन समः पापोऽस्मि न क्वचित्।<br>यथा तेनाद्य सत्येन जीवन्त्वसुरयाजकाः॥ ४३ | 'सर्वव्यापी जगद्गुरु भगवान् विष्णु सभी प्राणियोंमें व्याप्त हैं'—इस सत्यके प्रभावसे ये पुरोहितगण जीवित हो जायँ॥ ४०॥ यदि मैं सर्वव्यापी और अक्षय श्रीविष्णुभगवान्को अपने विपक्षियोंमें भी देखता हूँ तो ये पुरोहितगण जीवित हो जायँ॥ ४१॥ जो लोग मुझे मारनेके लिये आये, जिन्होंने मुझे विष दिया, जिन्होंने आगमें जलाया, जिन्होंने दिग्गजोंसे पीड़ित कराया और जिन्होंने सर्पोंसे डँसाया उन सबके प्रति यदि मैं समान मित्रभावसे रहा हूँ और मेरी कभी पाप-बुद्धि नहीं हुई तो उस सत्यके प्रभावसे ये दैत्यपुरोहित जी उठें॥ ४२-४३॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्तास्तेन ते सर्वे संस्पृष्टाश्च निरामयाः।<br>समुत्तस्थुर्द्विजा भूयस्तमूचुः प्रश्रयान्वितम्॥ ४४ | **श्रीपराशरजी बोले—**ऐसा कहकर उनके स्पर्श करते ही वे ब्राह्मण स्वस्थ होकर उठ बैठे और उस विनयावनत बालकसे कहने लगे॥ ४४॥ |
| पुरोहिता ऊचुः<br>दीर्घायुरप्रतिहतो बलवीर्यसमन्वितः।<br>पुत्रपौत्रधनैश्वर्यैर्युक्तो वत्स भवोत्तमः॥ ४५ | **पुरोहितगण बोले—**हे वत्स! तू बड़ा श्रेष्ठ है। तू दीर्घायु, निर्द्वन्द्व, बल-वीर्यसम्पन्न तथा पुत्र, पौत्र एवं धन-ऐश्वर्यादिसे सम्पन्न हो॥ ४५॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>इत्युक्त्वा तं ततो गत्वा यथावृत्तं पुरोहिताः।<br>दैत्यराजाय सकलमाचचक्षुर्महामुने॥ ४६ | **श्रीपराशरजी बोले—**हे महामुने! ऐसा कह पुरोहितोंने दैत्यराज हिरण्यकशिपुके पास जा उसे सारा समाचार ज्यों-का-त्यों सुना दिया॥ ४६॥ |
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमेंऽशे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
उन्नीसवाँ अध्याय
प्रह्लादकृत भगवत्-गुण-वर्णन और प्रह्लादकी रक्षाके लिये भगवान्का सुदर्शनचक्रको भेजना
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| श्रीपराशर उवाच<br>हिरण्यकशिपुः श्रुत्वा तां कृत्यां वितथीकृताम्।<br>आहूय पुत्रं पप्रच्छ प्रभावस्यास्य कारणम्॥ १ | **श्रीपराशरजी बोले—**हिरण्यकशिपुने कृत्याको भी विफल हुई सुन अपने पुत्र प्रह्लादको बुलाकर उनके इस प्रभावका कारण पूछा॥ १॥ |
| हिरण्यकशिपुरुवाच<br>प्रह्लाद सुप्रभावोऽसि किमेतत्ते विचेष्टितम्।<br>एतन्मन्त्रादिजनितमुताहो सहजं तव॥ २ | **हिरण्यकशिपु बोला—**अरे प्रह्लाद! तू बड़ा प्रभावशाली है! तेरी ये चेष्टाएँ मन्त्रादिजनित हैं या स्वाभाविक ही हैं॥ २॥ |
| श्रीपराशर उवाच<br>एवं पृष्टस्तदा पित्रा प्रह्लादोऽसुरबालकः।<br>प्रणिपत्य पितुः पादाविदं वचनमब्रवीत्॥ ३ | **श्रीपराशरजी बोले—**पिताके इस प्रकार पूछनेपर दैत्यकुमार प्रह्लादजीने उसके चरणोंमें प्रणाम कर इस प्रकार कहा— ॥ ३॥ |