भारतकोश
विष्णु पुराण

विष्णु पुराण

Vishnu Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 558 में से

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पृष्ठ 104

अ० १९] * प्रथम अंश * ९३


न मन्त्रादिकृतं तात न च नैसर्गिकं मम।<br>प्रभाव एष सामान्यो यस्य यस्याच्युतो हृदि॥ ४<br>अन्येषां यो न पापानि चिन्तयत्यात्मनो यथा।<br>तस्य पापागमस्तात हेत्वभावान्न विद्यते॥ ५<br>कर्मणा मनसा वाचा परपीडां करोति यः।<br>तद्बीजं जन्म फलति प्रभूतं तस्य चाशुभम्॥ ६<br>सोऽहं न पापमिच्छामि न करोमि वदामि वा।<br>चिन्तयन्सर्वभूतस्थमात्मन्यपि च केशवम्॥ ७<br>शारीरं मानसं दुःखं दैवं भूतभवं तथा।<br>सर्वत्र शुभचित्तस्य तस्य मे जायते कुतः॥ ८<br>एवं सर्वेषु भूतेषु भक्तिरव्यभिचारिणी।<br>कर्तव्या पण्डितैर्ज्ञात्वा सर्वभूतमयं हरिम्॥ ९<br>श्रीपराशर उवाच<br>इति श्रुत्वा स दैत्येन्द्रः प्रासादशिखरे स्थितः।<br>क्रोधान्धकारितमुखः प्राह दैतेयकिङ्करान्॥ १०<br>हिरण्यकशिपुरुवाच<br>दुरात्मा क्षिप्यतामस्मात्प्रासादाच्छतयोजनात्।<br>गिरिपृष्ठे पतत्वस्मिन् शिलाभिन्नाङ्गसंहतिः॥ ११<br>ततस्तं चिक्षिपुः सर्वे बालं दैतेयदानवाः।<br>पपात सोऽधधः क्षिप्तो हृदयेनोद्वहन्हरिम्॥ १२<br>पतमानं जगद्धात्री जगद्धातरि केशवे।<br>भक्तियुक्तं दधारैनमुपसङ्गम्य मेदिनी॥ १३<br>ततो विलोक्य तं स्वस्थमविशीर्णास्थिपञ्जरम्।<br>हिरण्यकशिपुः प्राह शम्बरं मायिनां वरम्॥ १४<br>हिरण्यकशिपुरुवाच<br>नास्माभिः शक्यते हन्तुमसौ दुर्बुद्धिबालकः।<br>मायां वेत्ति भवांस्तस्मान्माययैनं निष्षूदय॥ १५<br>शम्बर उवाच<br>सूदयाम्येव दैत्येन्द्र पश्य मायाबलं मम।<br>सहस्रमत्र मायानां पश्य कोटिशतं तथा॥ १६<br>श्रीपराशर उवाच<br>ततः स ससृजे मायां प्रह्लादे शम्बरोऽसुरः।<br>विनाशमिच्छन्दुबुद्धिः सर्वत्र समदर्शिनि॥ १७"पिताजी! मेरा यह प्रभाव न तो मन्त्रादिजनित है<br>और न स्वाभाविक ही है, बल्कि जिस-जिसके हृदयमें<br>श्रीअच्युतभगवान्‌का निवास होता है उसके लिये यह सामान्य<br>बात है॥ ४॥ जो मनुष्य अपने समान दूसरोंका बुरा नहीं<br>सोचता, हे तात! कोई कारण न रहनेसे उसका भी कभी<br>बुरा नहीं होता॥ ५॥ जो मनुष्य मन, वचन या कर्मसे<br>दूसरोंको कष्ट देता है उसके उस परपीडारूप बीजसे ही<br>उत्पन्न हुआ उसको अत्यन्त अशुभ फल मिलता<br>है॥ ६॥ अपने सहित समस्त प्राणियोंमें श्रीकेशवको वर्तमान<br>समझकर मैं न तो किसीका बुरा चाहता हूँ और न कहता<br>या करता ही हूँ॥ ७॥ इस प्रकार सर्वत्र शुभचित्त होनेसे<br>मुझको शारीरिक, मानसिक, दैविक अथवा भौतिक दुःख<br>किस प्रकार प्राप्त हो सकता है?॥ ८॥ इसी प्रकार भगवान्‌को<br>सर्वभूतमय जानकर विद्वानोंको सभी प्राणियोंमें अविचल<br>भक्ति (प्रेम) करनी चाहिये"॥ ९॥<br> **श्रीपराशरजी बोले—**अपने महलकी अट्टालिकापर<br>बैठे हुए उस दैत्यराजने यह सुनकर क्रोधान्ध हो<br>अपने दैत्य अनुचरोंसे कहा॥ १०॥<br> **हिरण्यकशिपु बोला—**यह बड़ा दुरात्मा है, इसे<br>इस सौ योजन ऊँचे महलसे गिरा दो, जिससे यह इस<br>पर्वतके ऊपर गिरे और शिलाओंसे इसके अंग-अंग छिन्न-<br>भिन्न हो जायँ॥ ११॥<br> तब उन समस्त दैत्य और दानवोंने उन्हें महलसे<br>गिरा दिया और वे भी उनके ढकेलनेसे हृदयमें श्रीहरिका<br>स्मरण करते-करते नीचे गिर गये॥ १२॥ जगत्कर्ता भगवान्<br>केशवके परमभक्त प्रह्लादजीके गिरते समय उन्हें जगद्धात्री<br>पृथिवीने निकट जाकर अपनी गोदमें ले लिया॥ १३॥<br>तब बिना किसी हड्डी-पसलीके टूटे उन्हें स्वस्थ देख दैत्यराज<br>हिरण्यकशिपुने परममायावी शम्बरासुरसे कहा॥ १४॥<br> **हिरण्यकशिपु बोला—**यह दुर्बुद्धि बालक कोई<br>ऐसी माया जानता है जिससे यह हमसे नहीं मारा जा<br>सकता, इसलिये आप मायासे ही इसे मार डालिये॥ १५॥<br> **शम्बरासुर बोला—**हे दैत्येन्द्र! इस बालकको मैं<br>अभी मारे डालता हूँ, तुम मेरी मायाका बल देखो। देखो,<br>मैं तुम्हें सैकड़ों-हजारों-करोड़ों मायाएँ दिखलाता हूँ॥ १६॥<br> **श्रीपराशरजी बोले—**तब उस दुर्बुद्धि शम्बरासुरने<br>समदर्शी प्रह्लादके लिये, उनके नाशकी इच्छासे बहुत-<br>सी मायाएँ रचीं॥ १७॥
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