विष्णु पुराण

विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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१०२ * श्रीविष्णुपुराण * [ अ० २१
इक्कीसवाँ अध्याय
कश्यपजीकी अन्य स्त्रियोंके वंश एवं मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन
| श्रीपराशर उवाच | श्रीपराशरजी बोले— |
|---|---|
| संह्लादपुत्र आयुष्माञ्छिबिर्बाष्कल एव च।<br>विरोचनस्तु प्राह्लादिर्बलिर्जज्ञे विरोचनात्॥ १ | संह्लादके पुत्र आयुष्मान् शिबि और बाष्कल थे तथा प्रह्लादके पुत्र विरोचन थे और विरोचनसे बलिका जन्म हुआ॥ १॥ |
| बलेः पुत्रशतं त्वासीद्बाणज्येष्ठं महामुने।<br>हिरण्याक्षसुताश्चासन्सर्व एव महाबलाः॥ २<br>उत्कुरः शकुनिश्चैव भूतसन्तापनस्तथा।<br>महानाभो महाबाहुः कालनाभस्तथापरः॥ ३ | हे महामुने! बलिके सौ पुत्र थे जिनमें बाणासुर सबसे बड़ा था। हिरण्याक्षके पुत्र उत्कुर, शकुनि, भूतसन्तापन, महानाभ, महाबाहु तथा कालनाभ आदि सभी महाबलवान् थे॥ २-३॥ |
| अभवन्द्वनुपुत्राश्च द्विमूर्द्धा शम्बरस्तथा।<br>अयोमुखः शङ्कुशिराः कपिलः शङ्करस्तथा॥ ४<br>एकचक्रो महाबाहुस्तारकश्च महाबलः।<br>स्वर्भानुर्वृषपर्वा च पुलोमश्च महाबलः॥ ५<br>एते दनोः सुताः ख्याता विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्॥ ६ | (कश्यपजीकी एक दूसरी स्त्री) दनुके पुत्र द्विमूर्धा, शम्बर, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और परमपराक्रमी विप्रचित्ति थे। ये सब दनुके पुत्र विख्यात हैं॥ ४-६॥ |
| स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>उपदानी हयशिराः प्रख्याता वरकन्यकाः॥ ७ | स्वर्भानुकी कन्या प्रभा थी तथा शर्मिष्ठा, उपदानी और हयशिरा—ये वृषपर्वाकी परम सुन्दरी कन्याएँ विख्यात हैं॥ ७॥ |
| वैश्वानरसुते चोभे पुलोमा कालका तथा।<br>उभे सुते महाभागे मारीचेस्तु परिग्रहः॥ ८ | वैश्वानरकी पुलोमा और कालका दो पुत्रियाँ थीं। हे महाभाग! वे दोनों कन्याएँ मरीचिनन्दन कश्यपजीकी भार्या हुईं॥ ८॥ |
| ताभ्यां पुत्रसहस्राणि षष्टिर्दानवसत्तमाः।<br>पौलोमाः कालकेयाश्च मारीचतनयाः स्मृताः॥ ९ | उनके पुत्र साठ हजार दानव-श्रेष्ठ हुए। मरीचिनन्दन कश्यपजीके वे सभी पुत्र पौलोम और कालकेय कहलाये॥ ९॥ |
| ततोऽपरे महावीर्या दारुणास्त्वतिनिर्घृणाः।<br>सिंहिकायामथोत्पन्ना विप्रचित्तेः सुतास्तथा॥ १० | इनके सिवा विप्रचित्तिके सिंहिकाके गर्भसे और भी बहुत-से महाबलवान्, भयंकर और अतिक्रूर पुत्र उत्पन्न हुए॥ १०॥ |
| व्यंशः शल्यश्च बलवान् नभश्चैव महाबलः।<br>वातापी नमुचिश्चैव इल्वलः खसृमस्तथा॥ ११<br>अन्धको नरकश्चैव कालनाभस्तथैव च।<br>स्वर्भानुश्च महावीर्यो वक्त्रयोधी महासुरः॥ १२ | वे व्यंश, शल्य, बलवान् नभ, महाबली वातापी, नमुचि, इल्वल, खसृम, अन्धक, नरक, कालनाभ, महावीर, स्वर्भानु और महादैत्य वक्त्र योधी थे॥ ११-१२॥ |
| एते वै दानवाः श्रेष्ठा दनुवंशविवर्द्धनाः।<br>एतेषां पुत्रपौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः॥ १३ | ये सब दानवश्रेष्ठ दनुके वंशको बढ़ानेवाले थे। इनके और भी सैकड़ों-हजारों पुत्र-पौत्रादि हुए॥ १३॥ |
| प्रह्लादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः कुले।<br>समुत्पन्नाः सुमहता तपसा भावितात्मनः॥ १४ | महान् तपस्याद्वारा आत्मज्ञानसम्पन्न दैत्यवर प्रह्लादजीके कुलमें निवातकवच नामक दैत्य उत्पन्न हुए॥ १४॥ |
| षट् सुताः सुमहास्तत्त्वास्ताम्रायाः परिकीर्त्तिताः।<br>शुकी श्येनी च भासी च सुग्रीवीशुचिगृध्रिकाः॥ १५ | कश्यपजीकी स्त्री ताम्राकी शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, शुचि और गृध्रिका—ये छः अति प्रभावशालिनी कन्याएँ कही जाती हैं॥ १५॥ |